Saturday, June 15, 2019

(अध्याय 3)                            

                                              टूटा चाँद !

आर्यन के जन्मदिन की मेहमानों की लिस्ट बन गई थी। उसके दोस्तों के साथ शहर की सभी माननीय हस्तियाँ तो थीं ही, बाहर से भी कई लोग बुलाये गये थे। मेरे अपने मेहमान तो उँगली पर गिनने लायक ही थे। मुझे बच्चों के फँक्शन में बड़ों का इतना बड़ा जमावड़ा समझ में नहीं आता है, लेकिन उससे क्या फ़र्क पड़ना था। घर में कुछ नहीं करना था, सब कुछ कॉन्ट्रैक्ट पर दे दिया गया था और हमें तैयार होके बस शामिल भर हो जाना था। आजकल तो ये आम बात हो गई है लेकिन उस समय इसका प्रचलन नहीं था, वो भी इलाहाबाद जैसे छोटे शहरों में। इसमें मुझे कभी संतोष नहीं मिला, वो जो ख़ुद अपनों के लिये आप प्यार से एक एक सूक्ष्म सजावट,मेन्यू वगैरह का ध्यान रखते हुए कोई पार्टी अरेंज करते हैं न, उसकी बात और तृप्ति ही कुछ और होती है। पर ससुराल में धन से हर सुविधा ख़रीद लेना ही शान समझी जाती थी। ये सही है कि मेरे पास समय की बहुत कमी थी, पर ये तो हर वर्किंग वूमन की कहानी है, मैं अपने घर परिवार के लिये बहुत कुछ करना चाहती थी लेकिन महसूस हुआ कि किसी को पसन्द नहीं, फिर मैंने भी इसपर सोचना छोड़ दिया। छोटे-छोटे पर्सनल टच, जैसे कभी किचेन में कुछ अपने हाथों से पका दिया, कभी कोई स्वेटर ही पति और परिवार के लोगों के लिये बना दिया, कुछ भी अपनी ख़ुशी से घरवालों के लिये कर दिया,ये सब बातें आपको अनोखी ख़ुशी तो देती ही हैं,आपका रिश्ता भी मज़बूत करती हैं। अपनी अपनी सोच है,हमारी परवरिश हमारे विचारों को प्रभावित करती है, क्लास डिफरेंस तो होता ही है। बहरहाल। ..... 
शाम हो गई थी, मेहमानों के आने का समय हो चला था। मास्टर आर्यन पूरे एरिया का फुदक-फुदक कर ज़ायजा ले रहे थे ! नवेली को भी तैयार कर दिया था। आज मैंने अपने लिये आसमानी रंग की शिफॉन की साड़ी निकाली  थी जिस पर सिल्वर ज़री और चाँदी के रंग के ही कुंदन का काम था। हील की सैंडल और खुले हुए बाल, बहुत दिनों बाद ख़ुद को सँवारने में कुछ समय दिया था। साथ में डायमंड का सेट ,ख़ुद पे ही प्यार आ गया ! काम-काज की भागमभाग में इतना टाइम ही नहीं बचता कि श्रिंगार किया जाये। उस दिन तो अमित मुझे हैरानी से देखते रह गए थे। "सम बॉडी इज़ लुकिंग डिफ्रेंट टुडे, उन्होंने हँस के कहा था !
पार्टी शुरू हो चुकी थी, बच्चे अपने ग्रूप में, बड़े अपने अपने ग्रुप में ड्रिंक्स और स्नैक्स एन्जॉय कर रहे थे। मेरी नज़र अर्चना के परिवार को ढूँढ रही थी , ऐसा तो होता नहीं कि वो लोग टाइम पर न पँहुचे हों, क्या बात हो गई, मन कुछ आशंकित हो उठा। 
तभी एक गाड़ी रुकी और कमिश्नर साहब का परिवार उतरा, डी.एम. ,और बाक़ी ज़िला स्तर के अधिकारी प्रोटोकॉल में उनका स्वागत करने बढ़ गये, मेज़बान अमित भी हाथ मिलाने लगे। मैं भी अर्चना और मम्मी की तरफ़ लगभग भागते हुए से लपकी, मेरी गुड़िया सो रही थी। अर्चना ने बताया कि उसे रूटीन शॉट्स लगवाये हैं जिससे उसे तेज़ बुख़ार हो गया है, इसीलिए आने में देर हो गई।  "और आपने इतना इन्सिस्ट किया था इसको साथ लाने के लिये तो इसके बिना तो हमारी हिम्मत नहीं थी यँहा आने की !" मैंने कहा कि "इसे मैं अपने रूम में सुला देती हूँ आराम से सोयेगी और शोर गुल से डिस्टर्ब नहीं होगी।" उसकी आया रजनी थी ही उसके साथ जो कमरे में उसका ख़याल रखेगी। 
हम सभी जगमगाती रात में संगीत का लुत्फ़ उठाते हुए महफ़िल का आनंद उठा रहे थे। बच्चे भाग दौड़ करते हुए अन्दर बाहर कर रहे थे तभी घर के अन्दर से कुछ नौकर भागते हुए आये और बोले कि छोटी बिटिया बिस्तर से गिर गई हैं और उनकी साँस बंद पड़ गई है। हम लोग हड़बड़ा कर अन्दर दौड़े तो देखा रजनी उसे गोद में लिये हिला रही है, बहुत घबराई हुई थी वह भी। "कैसे हुआ ये" लगभग हम सब ने एक साथ ही पूछा। उसे माउथ टू  माउथ दिया तो एक मिनट बाद उसने साँस लेनी शुरू की, अब भी बहुत मुश्किल हो रही थी उसे साँस लेने में, एम्बुलेंस भी आ गई थी तो जल्दी से उसे हॉस्पिटल ले जाया गया।ऑक्सीजन लगाया, रात भर उसे आई सी यू में रखा गया, घर आ कर नौकरों से पता चला कि रजनी बच्ची को छोड़ कर चाट की स्टॉल से पानी के बताशे खाने निकल ली थी और तभी आर्यन रूम से अपना कोई खिलौना, जो उसने वँहा फेंका होगा, उसे लेने गया और खिलौना खींचने में प्रशस्ति जिस बेबी शीट पर सोई थी वह भी उसके हाथों में आ गई और बेचारी फ़र्श पर गिर पड़ी। 
आर्यन सहमा सा एक कोने में छुप कर खड़ा था, उसे डर था कि आज तो उसकी कुटाई होगी। मन तो मेरा यही कर रहा था लेकिन वह भी एक अबोध बालक था, उसने जान बूझ कर ये हिमाक़त तो की नहीं थी लेकिन फिर भी उसकी वजह से नन्हीं प्रशस्ति को कितनी तकलीफ़ उठानी पड़ी। मैंने आर्यन को पास बैठा कर सांत्वना दी कि वो पिटेगा नहीं, पर उसकी इस हरकत से छोटी बेबी की जान भी जा सकती थी। रजनी की ग़ैर ज़िम्मेदारी पर बहुत आक्रोश था,अगले दिन मम्मी ने बताया कि उसे निकाल दिया गया है। जब प्रशस्ति दो दिनों के बाद ठीक हो कर घर आ गई तो मैं,अमित,आर्यन और नवेली उसके घर गये, आर्यन बहुत घबराया था, उसने अर्चना आंटी से सॉरी भी कहा। अर्चना और आशीष जी समझते थे कि नासमझ बच्चे से अनजाने में ये हुआ है और उन्होंने हँस के उसे गोदी में उठा लिया था। हम बच्ची को देखने अन्दर गये, वह इतने ही अरसे में काफ़ी कमज़ोर लग रही थी। उसकी नज़र जब मुझ पर पड़ी तो वो जैसे पहचानने लगी थी, मेरी गोदी में आने के लिए हाथ पैर तेज़ी से फेंकने लगी, मैंने बढ़ के उसे उठा लिया और सीने से चिपका लिया।
दिन पँख लगा कर उड़ते जा रहे थे। काम-काज के बोझ ने मशीन बना दिया था, लेकिन मुझे इस व्यस्तता में आनंद मिलता था। यँहा एक संतोष तो था कि मरीज़ों की ज़िम्मेदारी पूरी मेरी थी और कितनी दुआयें मिलती थीं जब पेचीदे केस मेरे हाथ से ठीक हो जाते थे। मेरा काफी समय इधर ही बीतता था। एक दिन छुट्टी का होता था तो अब मैं अपने बच्चों को लेकर कँही दूर निकल जाती थी इस बात की परवाह किये बग़ैर कि अमित क्या सोचेंगें। हम कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें, लोगों को ज़बरदस्ती ख़ुश नहीं कर सकते इसलिये कम से कम अपने आप को तो ख़ुश रखें। मेरे दोनों बच्चों को बोर्डिंग में रह के पढ़ना तय था, तो मैं ये बचपन के राशन में मिले लम्हों को खोना नहीं चाहती थी। कभी ऐसा भी होता था कि अर्चना अपनी बेटी के साथ हमें जॉइन कर लेती थीं। नवेली को प्रशस्ति बहुत पसँद आने लग गई थी, लड़कियों को छोटे बच्चे अमूमन अच्छे लगते ही हैं, ये उनकी instinct में होता है। अर्चना की मम्मी रिटायर होने के बाद उन्हीं लोगों के साथ रहने लगी थीं, इससे दोनों पति-पत्नी को बहुत सहारा हो गया था। बच्ची को nanny के भरोसे छोड़ने के लिये दिल गवाही नहीं देता था और उनका नेचर ऑफ़ जॉब ऐसा था कि टूर हमेशा करना पड़ता था। अर्चना अपने कैरियर के लिये काफी समर्पित थीं इसलिये लम्बी छुट्टी वो लेना नहीं चाहती थीं।
प्रशस्ति ने चलना और बोलना साल भर की होने से पहले ही शुरू कर दिया था। अब उसकी पहली सालगिरह भी आने वाली थी। कमिश्नर साहब के बँगले पर शानदार पार्टी का आयोजन था। क्रिसमस और उसका जन्मदिन.. साथ-साथ ही पड़ते थे। दोहरी रौनक थी, रौशनी केवल उसके घर में  ही नहीं बल्कि पूरे शहर में थी, या यूँ कहें कि उसका जन्मदिन तो पूरी दुनिया मना रही थी ! उसकी बड़ी बहनें भी आई थीं,winter vacation थी स्कूल में, दोनों अपनी छोटी बहन को बहुत प्यार से कभी गोदी में, कभी हाथ पकड़ के सारे इंतज़ाम का मुआयना करवा रही थीं। देख कर बहुत अच्छा लगा, प्रशस्ति ने लाल और सफ़ेद रँग का टॉप और जैकेट पहना था,ब्लैक जीन्स थी और वह गज़ब की स्मार्ट और सुन्दर लग रही थी। केक कटने के बहुत देर बाद तक पार्टी चलती रही थी। आशीष जी ने सबके सामने प्रशस्ति के जन्म में मेरे योगदान को लेकर एक अच्छी ख़ासी स्पीच दे डाली थी, अर्चना ने मुझे देर तक गले से लगाये रखा और मेरा शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि मेरी वजह से उनकी प्रशस्ति -यात्रा आज एक जीती जागती हक़ीकत है और इतना अनमोल तोहफ़ा उनके पास सलामत है !मैंने कहा था कि "सब ईश्वर की कृपा है और मैं बस एक माध्यम हूँ" लेकिन उनके लिये मैं एक फ़रिश्ता बन गई थी। पार्टी ख़त्म होने पर जब हम बाहर निकलने लगे तब भी प्रशस्ति जगी हुई थी और वह भी आलिया की गोद में बाहर आई हम सबको छोड़ने। आसमान पे चाँद आधा था और उसने पूछा, " चाँद टूटा क्यूँ  ?"उच्चारण एकदम साफ़,कोई तोतलापन नहीं ..... उसका ये सवाल बड़े बड़े लोगों को अचरज में डाल गया। इतनी छोटी बच्ची कितनी गहरी बात बोल गई,हम सब चाँद आधा ही कहते आये हैं, इसको कौतूहल है कि गोल चाँद कैसे टूट गया !बहुत लोगों ने उस दिन आशीष जी और अर्चना को कहा कि आपकी बच्ची जीनियस होगी !
                                                                                                  क्रमशः
                                                                                          आरती श्रीवास्तव

Wednesday, June 12, 2019

(अध्याय 2 )

   

                                               स्नो ड्रॉप 

                                           (Snow Drop)

ज़िन्दगी की रेल अपनी पटरियों पर चल रही थी। वही भागमभाग, वही ज़द्दोज़हद ,वही क़शमक़श। मार्च का महीना आने वाला था, आर्यन तीन साल का होने वाला था। पापा ने कहा था कि डिज़नीलैंड में मनायेंगे उसका जन्मदिन पर मम्मा का कहना था कि अभी बहुत छोटा है उसे कुछ याद नहीं रहेगा, कम से कम पाँच साल का हो जाये तो वो ज़्यादा एन्जॉय करेगा। मेरी भी यही राय थी, अमित दोनों ही स्थिति में ख़ुश थे बस एक शानदार पार्टी चाहते थे। उनका ये कहना था कि पाँच साल का होने पर तो वह अमेरिका जा ही रहा है पढ़ने तो अभी न जाये तो भी चलेगा। मैं चौंक पड़ी थी, मेरा बेटा और मुझे ही उसके भविष्य की ख़बर देना किसी ने ज़रूरी नहीं समझा। मैंने एतराज़ भी किया था कि "इतने छोटे बच्चे को कैसे भेज सकते हैं अकेले इतनी दूर"? अमित बोले "लीव इट फॉर सम अदर डे ,डोंट यू नो देट इट इज़  फ़ैमिली ट्रैडीशन टु गो टू यू एस फॉर स्टडी " ? "बट एट दिस टेंडर एज,आर यू किडिंग मी "? लेकिन पापा ने हमें उस समय लड़ने से रोक लिया था। "भई बच्चे की पार्टी प्लान करो तुम लोग,लड़ने झगड़ने को तो पूरी उम्र पड़ी है !" मैं चुप हो गई थी पर जानती थी कि मैं कोई भी  निर्णय अपने  बच्चों के लिये नहीं ले सकती। अमित की बहन न्यू जर्सी में रहती हैं और आर्यन को वहीं छोड़ा जाने वाला है। ग़ुस्से में मैं उसी समय वहाँ से उठ गई थी। कार स्टार्ट की और बिना कुछ ख़्याल किये अर्चना के घर आ गई। 
              घर में अर्चना नहीं थीं न ही मिस्टर भट्टाचार्य। बच्चियाँ बोर्डिंग में वापस चली गई थीं। चपरासी ने बैठाते हुए कहा कि माताजी आ रही हैं। कुछ देर में मम्मी प्रशस्ति को गोद में लेकर आयीं, मैंने खड़े हो कर नमस्ते की। "सुखी रहो बेटी, सदा प्रसन्न रहो !" "अरे वाह ये तो जगी हुई है !" मैंने उसे देख कर कहा। तीन महीने की हो गई थी,सिर पर बाल घने से निकल आये थे, नानी की मालिश और तजुर्बे की वजह से थोड़ी गोल मटोल भी हो गई थी, गाल भी चबी हो गये थे कुल मिला कर बहुत cute लग रही थी। गुलाबी ड्रेस में खिली गुलाब की कली, एकदम गुड़िया लग रही थी। मैं उसे निहार रही थी, आँखों के पटल पर वह दृश्य भी था जब एक बेजान,मरियल सी बच्ची जिसकी साँस अक्सर बन्द हो जाती थी,जिसको दुनिया में उसी के प्राणदाता लाना ही नहीं चाहते थे, जिसे ज़िन्दा डिलीवर कराना एक चुनौती बन गया था, जब मेरे हाथों में थी तो एक पल लगा था कि मृत पैदा हुई है.. जिसकी सूरत, शक्ल, काया सभी कुछ साधारण से भी कमतर था।  आज वही प्यार, तवज्जो और मेडिकल साइंस की वजह से नायाब कली सी खिल गई थी। मैंने उसे अपनी गोद में ले लिया था और उसने मेरी उँगली अपने छोटे से हाथों में कस के पकड़ ली थी और अब वो मुझे निरन्तर देख रही थी। मेरे सारे दुःख -दर्द हवा हो गये उसी पल और मुझे अचानक स्नो ड्रॉप की याद आई, जो बर्फीले मैदान में जब कोई भी वेजिटेशन नहीं हो सकता तब भी उग आता है और उसका फूल सारी विपरीत परिस्थितियों को शिक़स्त देते हुए खिल पड़ता है। बहार के आगमन का सँकेत देता है और हमें ये प्रेरणा कि चाहे कुछ भी हो हार जाना बेमौत मर जाना है, ज़िंदगी तो डट कर सामना करने का नाम है हर उस बला का जो आपके लिये ख़तरा हो। प्रशस्ति यात्रा ऐसा ही पौधा है, स्नो ड्रॉप है ये जो मुझे जीने का हुनर सिखा रही है! जिसके जन्म में मेरा भी  कुछ योगदान रहा था वही आज मेरे जीवन की प्रेरणा श्रोत बन गई है  !

                                                                                                                        क्रमशः 
                                                                                                                आरती श्रीवास्तव

Tuesday, June 11, 2019

   (अध्याय 1)                                         

                                         प्रशस्ति-यात्रा 

 

20 साल पूर्व... 
आज बहुत अनमनी सी हूँ,बाहर आसमान पर घने जामुनी बादल छाये हैं लेकिन हमेशा की तरह ये मन को खुश नहीं कर रहे बल्कि डिप्रेस कर रहे हैं। नर्सिंग होम में कोई ख़ास काम नहीं है मेरा,कोई डिलीवरी ,कोई c section कुछ नहीं,इस लिये  कुछ राहत है।  ये मौसम हमेशा मन को मगन करता रहा है,लेकिन आज पता नहीं क्यों तन-मन दोनों ढीले हैं। पता नहीं कहना शायद ग़लत होगा क्योंकि मैं भी जानती हूँ कि जीवन की भागदौड़ और उलझनों का सीधा असर मन पर पड़ता है और मेरे जीवन में अब सुकून की बेहद कमी है। ज़ाहिर तौर पे इज़्ज़त,शोहरत और दौलत किसी चीज़ की कोई कमी नहीं,बल्कि यूँ कहें कि ये सब बेशुमार हैं तो कुछ ग़लत न होगा।  लेकिन इन सब से ही अगर खुशियाँ मिलती होतीं तब तो कोई ग़रीब कभी ख़ुश ही न हो पाता।  अक्सर वही हमसे अधिक सुखी होता है और हम uppar class के लोग चिंता में जल कर हज़ारों बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।  मैं इलाहबाद में s s nursing home की मालकिन और शहर की मशहूर गाइनी डॉक्टर सुरेखा शर्मा ,38 वर्ष की आयु में टॉप के डॉक्टर्स में मेरा नाम शामिल और पति अमित शर्मा शहर के टॉप के एडवोकेट ,पाँच पीढ़ियों से पिता,दादा,परदादा high court में जज रहते आये हैं,अमित की जजशिप भी लगभग पक्की है।  ससुर जी हाईकोर्ट में जज हैं और पुश्तैनी प्रॉपर्टी का कोई लेखा जोखा नहीं , सब एफ़रात है। दो साल का बेटा है मेरा और चार साल की बेटी।  सब कुछ होकर भी लगता है जैसे हासिल कुछ भी नहीं... 
                          "मैम , बाहर कमिशनर साहब और उनकी मिसेस आयी हैं,आपसे मिलना है" वार्ड बॉय ने जल्दी जल्दी बताया।  मैं उसके साथ ही चल दी,ख़ाली ही बैठी थी। ऑफ़िस में घुसते ही मिस्टर भट्टाचार्य ने उठ कर अभिवादन किया   "hello doctor ,myself Ashish Bhattachaya and this  is my wife Archana ". अर्चना ने हल्के नर्वस स्वर में हाय कहा।  मिस्टर भट्टाचार्य को तो हम सभी जानते थे आख़िर शहर के कमिश्नर थे और कभी कभी किसी पार्टी में दिख जाते थे पर उनकी पत्नी से पहली मुलाक़ात थी।  हल्की ग्रे कलर की साड़ी ,स्लीवलेस ब्लाउज़ में एक मध्यम कद काठी का बेहद आकर्षक व्यक्तित्व,बॉब कट बाल लेकिन चेहरे पर बेतहाशा टेन्शन। 
"बताइये कैसे आना हुआ" मैंने पूछा।  मुझे लग रहा था शायद mamogram कराना होगा अर्चना को या रूटीन फिजिकल।  उसने थोड़ा हकलाते हुए कहा "अबो्र्ट आई मीन एबॉर्शन कराना है" ;मिस्टर भट्टाचार्य दूसरी तरफ़ देखने लगे थे। 
मैं तो डॉक्टर हूँ,बहुत तरह के कैसेज़ आते ही रहते हैं पर इस क्लास से ये केस, दोनों चालीस पार की उम्र के होंगे ... एक सेकेंड मुझे भी आश्चर्य हुआ पर उसे छुपाते हुए मैंने कहा "मैं पर्सनली ये नहीं करती जब तक कि केस कॉम्प्लिकेटेड न हो लेकिन मेरे यहाँ एक बहुत अच्छी डॉक्टर हैं उन्हें....."
मुझे बीच में ही टोकते हुए अर्चना बोलीं  "complication है तभी आपके पास आये हैं " इस बार उनकी आवाज़ में फर्मनेस थी।  "हम इस सिटी में नहीं चाहते थे ऐसा कुछ हो लेकिन दूसरे डॉक्टर्स बहुत रिस्की बता रहे हैं,आपको ही refer किया गया,एक्चुअली  पता ही नहीं चला कब ये accident आई मीन कन्सीव कर लिया,ऊपर से वन इन अ मिलियन केस भी बता रहे हैं ,bridge baby है,लेकिन किसी हाल में हमें ये नहीं चाहिये ,हमारे teenager बच्चे है क्या सोचेंगे..." वो अचानक रो पड़ीं।
कुछ देर सन्नाटा। .. मिस्टर भट्टाचार्य बहुत uneasy हो गये थे,लेकिन धैर्य से बैठे रहे थे,अर्चना शर्म,भय और घबराहट से जैसे पानी पानी हुई जा रही थीं। मैंने उनकी स्थिति समझते हुए कहा "ब्रीच बेबी तो कोई ऐसा  मेजर इशू नहीं है लेकिन एबॉर्शन करने के पहले कुछ टेस्ट होंगे,उसे आप आज ही करवा लें फिर कल रिपोर्ट्स देख कर मैं ख़ुद आपका---" 
"अरे वो सब टेस्ट्स हो चुके हैं रिपोर्ट्स की पूरी फाइल मेरे पास है आप देख सकती हैं"... 
मैंने फाइल देखनी शुरू की, ब्लड-प्रेशर fluctuating ,शुगर लेवल बहुत हाई और उसके ऊपर 20 वीक की प्रेगनेंसी ,उम्र 42 की,यहाँ एबॉर्शन तो बहुत ख़तरनाक़ है ही,डिलीवरी तो एकदम जानलेवा है। मैंने कहा कि "देखिये ये काफ़ी पेचीदा केस है मुझे थोड़ा स्टडी करने दें, कल आप नौ बजे सुबह आइये, अकेले आइयेगा फिर इत्मिनान से हम इसपर सोच समझ कर डिसाइड करेंगे"।
                                             मिस्टर और मिसेज़ भट्टाचार्य उठे और जाते जाते अर्चना ने एक बेबसी से मुझे देखा,वो नज़र अंदर तक मुझे हिला के रख गयी। एक प्रार्थना,एक याचना और शायद थोड़ी उम्मीद भी,उस नज़र में ये सभी कुछ था। 
घर आते वक़्त भी केस के बारे में ही सोचती रही। अमित अभी वापस नहीं लौटे थे, उनका रोज़ का यही क़िस्सा रहता है,या तो चैम्बर में क्लाइंट के साथ या फिर दोस्तों की महफ़िल में शराब और शबाब। ख़ानदानी रईस शायद ऐसे ही होते होंगे,मुझे तो पता नहीं,मैं एक मिडिल क्लास फ़ैमिली से थी,डैडी सरकारी डॉक्टर थे,छोटे छोटे कस्बों और शहरों में ही तबादले होते रहे,कभी प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं की।आख़िरी पोस्टिंग भाग्य से इलाहबाद की मिली थी जहाँ से मैंने M.B.B.S. किया और एक साँस्कृतिक समारोह में हिस्सा लिया था जहाँ अमित के डैड चीफ़ गेस्ट थे और उन्हें मैं इतनी भा गयी थी कि उन्होंने अपने बेटे के लिये मुझे चुन लिया। शादी हमारी उसके दस साल बाद हुई,मैं तो पढ़ाई में बिज़ी थी और अमित शादी ही नहीं करना चाहते थे और उस समय अमेरिका में हारवर्ड से लॉ में पोस्ट ग्रैड भी  कर रहे थे । हम दोनों की उम्र में 11 साल का अन्तर है। उम्र का ये अन्तर घर में किसी  ने नहीं देखा,इतनी बड़ी खानदानी फ़ैमिली से रिश्ता आया था,जज साहब का काफ़ी नाम भी था,बहुत आलीशान कोठी,नौकर,गाड़ियाँ ---आख़िर कमी ही क्या थी कि इन्कार होता!
                                                            आर्यन (मेरा बेटा ) जो दो साल का था, गहरी नींद में सो रहा था और चार साल की नवेली अभी करवट बदल रही थी। मुझे देखते ही दौड़ते हुए आ कर गोद में लेने के लिये मचलने लगी। मैंने उसे सीने से चिपकाते हुए ढेर सारी पप्पी दी फिर वह कुछ देर में सो गयी।
मुझे भूख नहीं थी इसलिये बिरजू काका से मैंने कहा कि वह अपने क़्वार्टर में जाकर आराम करें,लेकिन वह बिना कुछ खिलाये कहाँ मानने वाले थे,एक फ़ुल्का और सौंफ़ वाले करेले की सब्ज़ी एक कटोरी दही के साथ लेते आये और बहूरानी को खिला कर ही रवाना हुए। 
        मैं कल के बारे में सोचते सोचते सो गई।  सुबह नवेली को स्कूल भेज कर नाश्ते की मेज़ पर आई तो अमित से मुलाक़ात हो गई! जनाब अख़बार पढ़ रहे थे,एक स्माइल के साथ फ़ॉर्मल सी गुड़ मॉर्निंग हुई और दोनों अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त। पापा मम्मा एक शादी में गए थे, घर में आर्यन ही रह जाना था और वह आया से मालिश करवा रहा था। मैंने आया को कुछ निर्देश दिये जो मैं बिना नागा रोज़ ही उसे देती थी,उसने भी मुस्कुराते हुए मुझे सुना और टाटा कर दिया!
आठ बजे तक नर्सिंग होम पहुँच जाती हूँ,एक घंटा राउण्ड और स्टाफ़ से अपडेट लेने में निकल जाता है,कोई सर्जरी होती है तो 6 बजे से शुरू करती हूँ,आज ऐसा नहीं था,असल में ऑफिशियली मुझे छुट्टी पर होना चाहिये था,जिस शादी में पापा लोग गये हैं,हमें भी जाना था मगर अमित के किसी क्लाइंट का कोई केस फँस गया तो वो नहीं जा सके फिर मेरा भी मन नहीं हुआ। सालों से फंक्शन्स में अकेले जा जा कर ऊब चुकी हूँ,अमित तो बेहद बिज़ी रहते हैं अब मैं भी नहीं जाना चाहती। 
नौ बजे शार्प अर्चना हाज़िर थीं। समय की एकदम पक्की,मुझे उनकी ये बात बहुत पसँद आई ,मुझे भी ऑन टाइम पहुँचने का मीनिया सा है! आज भी चिन्ता की लकीरें उनके चेहरे पर। मैंने मुस्कुरा कर उनका स्वागत किया पर वो डरी हुई सी थीं। मैंने उनसे कहा "देखिये आप अपने डर और शर्म को किनारे रख दीजिये, मेरे ख़याल से आप सुरक्षित हाथों में हैं!" इसपर वो ज़रा सा हँस दीं ,हँसी बहुत प्यारी सी थी। "आप रिलैक्स होकर बैठिये तब कुछ फैक्ट्स शेयर करती हूँ। " उन्होंने एक गहरी साँस ली और पीठ पीछे टिका कर बैठ गयीं। मैंने कहा " एट दिस पॉइंट ऑफ़ टाइम,एबॉर्शन इज़  नॉट ओनली डेंजरस बट इललीगल टू। कोई मिडवाइफ करे तो करे,हमारे प्रोफ़ेशन में कोई भी इस्टैब्लिश डॉक्टर इसे नहीं करेगा। लेकिन डिलीवरी कराना और भी कॉम्प्लिकेटेड है ,मदर और बेबी दोनों की जान को ख़तरा हो सकता है। आपसे फिर भी पूरे विश्वास के साथ कहूँगी कि  मुझे ये केस क़बूल है और मैं अपनी पूरी शक्ति लगा दूँगी आप और आपके बेबी को सेफ रखने में, और जहाँ तक आपके टीन बच्चों का सवाल है,वो भी ग्रेजुअली इसे एक्सेप्ट कर लेंगे फिर दुनिया की सोच कर एक जान का क़त्ल करना गुनाह ही तो होगा ना। इस बच्चे की जान लेने का हक़ हमें नहीं है,जब हम किसी में जान डाल नहीं सकते तो मारने का गुनाह भी नहीं कर सकते। " 
                                    एक लम्बी चुप---------"मुझे रात भर नींद नहीं आई, ऐसा लग ही रहा था कि आप यही कहेंगीं तो मन को समझा रही थी। लेकिन आपके कहने का ढँग बहुत सूदिंग है, वी आल्सो डोंट वॉन्ट टू किल द अनबॉर्न बेबी बट----मेरी दो बेटियाँ हैं,देहरादून में welhams school में पढ़ रही हैं, फिर सोशल सर्कल है आशीष का भी और मेरा भी,मैं इंडियन इंजीनियरिंग सर्विस में हूँ रेलवे में,इस उम्र की प्रेगनेंसी में सभी मज़ाक़ बनायेंगे।"
     "मैं आपकी बात समझ रही हूँ लेकिन कभी कभी हम ज़मीन वाले नहीं समझ सकते कि ऊपर वाले की क्या रज़ा है,उसकी रज़ा में राज़ी रहने में ही ख़ैर है। बेबी तो साँस ले रहा है और इतनी कठिन सिचुएशन में भी अपने आने का पूरा इंतज़ाम कर चुका है,आपको और हम सबको तो बस अब इसका रास्ता स्मूथ बनाना है! कमिश्नर साहब को ये खुशख़बरी दीजिये और ख़ुशी ख़ुशी इस बच्चे को दुनिया में आने दीजिये प्लीज़।" आज एक भाषण ही दे डाला मैंने,पता नहीं क्यों इस अनबॉर्न बेबी और अर्चना दोनों से एक मोहब्बत सी हो गई ,शायद कोई पिछले जन्म का कार्मिक कनेक्शन हो, नहीं तो हम अपना काम बिना किसी से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए ही करने की कोशिश करते हैं और जुड़ाव भी महज़ दो मीटिंग में भला किसी से होता है!
               'ठीक है डॉक्टर सुरेखा, अगला अपॉइंटमेंट कब का है?" कहते हुए अर्चना ने अपना बैग उठाया। उनके चेहरे का डर और शर्म ग़ायब ,था तो एक उल्लास। आख़िर क्यों न होता,कौन माँ दिल से अपने ही बच्चे का क़त्ल करना चाहेगी। 
मैं भी अपने अगले मरीज़ को देखने में व्यस्त हो गई। एक अनजानी सी ख़ुशी मुझे भी थी उन्हें कन्वींस करके। उस रात घर पहुँच कर अपने दोनों बच्चों को देर तक निहारती रही थी। मुझसे चार साल ही बड़ी थीं अर्चना, लेकिन मेरी शादी देर से हुई थी तो मेरे बच्चे अभी बहुत छोटे थे। 
                    छोटा सा शहर है इलाहबाद,तब और भी गांव जैसा था,ये ख़बर ऑफ़िसर्स सर्कल में जँगल की आग की तरह फ़ैल गई,गॉसिप का नया मसाला मिल गया लोगों को, क्या मर्द क्या औरत,हर कोई मिस्टर भट्टाचार्य और मिसेज़ वर्मा,जी हाँ,अर्चना ने अपना मेडेन नेम चेंज नहीं किया था, के ही बारे में दबे छुपे मज़ाक कर रहा था। उनकी डॉक्टर होने की वजह से मैं भी बहुत हॉट इंटरेस्ट की जैसे चीज़ हो गई थी,मुझसे लेडीज़ पूछतीं कि क्या मिसेज़ कमिश्नर को कोई कम्प्लीकेशन है या सब नॉर्मल है , वैसे बहुत गर्मी है दोनों के अँदर -- मुझे बहुत कोफ़्त होती,कई बार तो मैंने झिड़क भी दिया कि ये उनका पर्सनल मैटर है और इस बारे में जोक्स शोभा नहीं देता। 
      
हर बार अपॉइंटमेंट के समय पति-पत्नी दोनों आते, वक़्त के साथ उनकी हिचकिचाहट भी जाती रही थी। इसी दौरान अर्चना मेरी बहुत प्रिय दोस्त बन गई थीं, दोनों की फ़ील्ड अलग अलग थी, लेकिन सोच कॉमन थी। हम ख़ाली समय निकाल के अक्सर मिलने लगे थे और मज़े भी करते थे। आख़िरी तीन महीनों में अर्चना की तबीयत बहुत ख़राब हो गई, कभी ब्लीडिंग हो जाती, कभी ऑक्सीजन लगाना पड़ता तो कभी बेबी की हार्ट बीट नहीं मिलती, बेड रेस्ट पर ही थीं वह। एक बार कहने लगीं कि "आशीष बहुत अकेले हो जायेंगे मेरे  बिना", मैंने उन्हें झिड़क के चुप कराया कि क्यों ज़रूरी है फ़ालतू बातों को सोचना। एक दिन उनकी हालत बहुत बिगड़ गई,कई घंटे होश नहीं रहा, जब आया तो मैं और मिस्टर भट्टाचार्य सामने ही खड़े थे उनके,रो के कहने लगीं "मुझे ये बेबी नहीं चाहिये था,टाइम पर पता चल गया होता तो आज ये नौबत नहीं आती, क्यों नहीं कोई सिम्पटम मिला,नॉर्मली चक्कर, उल्टी ये सब होता है, पीरियड्स मेरे कई महीनों से बंद थे ,मुझे क्या पता था तब भी ये एक्सीडेंट हो जायेगा।  पता होता तो कितनी आसानी से... ,बस उसका क़त्ल नहीं करना चाहती थी इसलिये मान गई हूँ  इसे जन्म देने के लिये । एक बोझ है जो उठाना पड़ रहा है, एक क़र्ज़ है शायद इसका जो हमें चुकाना पड़ रहा है। " फिर वो फ़फ़क कर रो पड़ीं। मिस्टर भट्टाचार्य ने कहा "वॉट आर यू टॉकिंग डियर, ये टाइम नहीं है इन सब बातों का,सब ठीक हो जायेगा। "
डिलीवरी के समय अर्चना की मम्मी आ गई थीं , इलाहबाद डिग्री कॉलेज की प्रिंसिपल थीं जो अभी रिटायर हुई थीं, वो संस्कृत की प्रोफ़ेसर रही हैं । सी सेक्शन ही होना था लेकिन बहुत नाज़ुक़ केस था, दो बार तो मुझे लगा कि माँ और बेबी दोनों को बचाना नामुमकिन है, लेकिन मैंने भी ज़िद कर ली थी कि अपने पूरे कैरियर का सारा ज्ञान लगा दूँगी इन दोनों को ख़ैरियत के साथ दूसरा जन्म देने में, दोनों का पुनर्जन्म ही था क्योंकि अर्चना ही नहीं,बेबी की हार्ट बीट भी कुछ देर मिसिंग हो गई थी। भगवान ने मेरी लाज रख ली थी और एक चमत्कार ही था कि कई घंटों की कोशिशों के बाद एक नन्हीं सी जान ने दुनियाँ में अपनी आँखें खोली थीं ! बेटी हुई थी, लेकिन ये क्या,बच्ची रो नहीं रही थी। स्टिल बोर्न तो नहीं,एक मिनट दिल धक् से हो गया। उसे ठोंका गया,कोई आवाज़ नहीं, धड़कनें तो उसकी रह रह के बंद हो जाती थीं, स्पेशलिस्ट को पहले से ही बुला रखा था,उन्होंने 5 -10 मिनट बाद बेबी को हमें देते हुए कहा कि  अब आउट ऑफ़ डेंजर है,लेकिन इनक्यूबेटर में रखना होगा,बहुत कमज़ोर है। मैं ख़ुद डॉक्टर अभिनव के साथ गई ये ख़बर अर्चना के पति और मम्मी को देने। दोनों इंतज़ार ही कर रहे थे,पहला प्रश्न अर्चना को लेकर ही था, मैंने तसल्ली दी कि वह ठीक हैं लेकिन होश में आने में अभी कुछ समय लगेगा। बच्ची को देखने के लिये उन्हें अपने साथ ले गई, मम्मी बहुत उत्साहित हो गईं उसे देख कर, पूछने लगीं दामाद से कि कैसी लगी बेबी? मिस्टर भट्टाचार्य थोड़ा मुस्कुरा दिये  लेकिन बोले कुछ नहीं। 
15 दिनों के बाद माँ बेटी को डिस्चार्ज कर दिया,बच्ची को जॉन्डिस हो गया था, अर्चना अब पहले से बेहतर थीं। इसके बाद मैं घर और नर्सिंग होम में कुछ ज़्यादा बिज़ी हो जाने की वजह से अर्चना के घर नहीं जा पाई थी। सवा महीने बाद उनके यहाँ से कॉल आई, अर्चना बोलीं कि  "मम्मी ने नामकरण रखा है,आना ज़रूर है। " मैंने भी वादा किया कि ज़रूर आऊँगी। तय दिन वहाँ पहुँच गई थी,पूजा में अर्चना की मम्मी ही अपनी गोद में बच्ची को लेकर बैठी थीं, नाम पंडित ने पूछा तो कोई उत्तर नहीं, किसी ने नाम सोचा ही नहीं था,बस उसे बेबी कह कर बुलाते थे। उसी दिन उनकी दोनों बड़ी लड़कियों को देखा जो देहरादून से आई थीं, बड़ी का नाम जिया और छोटी का आलिया।उनके चेहरे से एम्बैरेस्मेंट साफ़ झलक रहा था, दोनों में घनघोर ATTITUTE भी नज़र आ रहा था , और भला क्यों नहीं , इतने मशहूर स्कूल से पढाई जो कर रही थीं। ख़ैर इधर पंडित धैर्य खो से रहे थे लेकिन कमिश्नर साहब से कुछ बोल तो सकते नहीं थे, बच्ची का नामकरण का दिन और नाम ही नहीं सोच के रखा! तभी अर्चना की मम्मी बोलीं " आशीष अगर तुम लोग ठीक समझो तो बेबी का नाम मैं रख दूँ" ? कमिश्नर साहब ने एक सेकेंड नहीं लगाया हाँ में उत्तर देने में। मम्मी ने बेबी के कान में कहा , "तो अब से तुमको सब प्रशस्ति-यात्रा के नाम से बुलायेंगे। प्रशस्ति का मतलब है प्रशंसा यानि  प्रेज़ और यात्रा है जर्नी।" मुझे ये नाम बहुत मन भा गया,मैंने ताली बजाते हुए कहा कि "journey of praise begins !" 

                                                                                                     क्रमशः 
                                                                                          ---आरती श्रीवास्तव
                                  

 



Monday, June 10, 2019

आज अपने विचारों का लेखा-जोखा या ताना-बाना एक आकार सा पा गया है. तिरंगी अभिव्यक्ति में मैंने अपने हिन्दी ,english और उर्दू लेखन को साँझा करने का सपना बुना है,उम्मीद रखती हूँ कि आप सबको पसन्द आये।

(अध्याय 10 )                                    बरसात की वो रात  शाम को कुछ बूंदा-बांदी होने लगी। रात तक घनघोर बारिश के आसार थे। ऐसी जाड़े की...