(अध्याय 2 )
स्नो ड्रॉप
(Snow Drop)
ज़िन्दगी की रेल अपनी पटरियों पर चल रही थी। वही भागमभाग, वही ज़द्दोज़हद ,वही क़शमक़श। मार्च का महीना आने वाला था, आर्यन तीन साल का होने वाला था। पापा ने कहा था कि डिज़नीलैंड में मनायेंगे उसका जन्मदिन पर मम्मा का कहना था कि अभी बहुत छोटा है उसे कुछ याद नहीं रहेगा, कम से कम पाँच साल का हो जाये तो वो ज़्यादा एन्जॉय करेगा। मेरी भी यही राय थी, अमित दोनों ही स्थिति में ख़ुश थे बस एक शानदार पार्टी चाहते थे। उनका ये कहना था कि पाँच साल का होने पर तो वह अमेरिका जा ही रहा है पढ़ने तो अभी न जाये तो भी चलेगा। मैं चौंक पड़ी थी, मेरा बेटा और मुझे ही उसके भविष्य की ख़बर देना किसी ने ज़रूरी नहीं समझा। मैंने एतराज़ भी किया था कि "इतने छोटे बच्चे को कैसे भेज सकते हैं अकेले इतनी दूर"? अमित बोले "लीव इट फॉर सम अदर डे ,डोंट यू नो देट इट इज़ फ़ैमिली ट्रैडीशन टु गो टू यू एस फॉर स्टडी " ? "बट एट दिस टेंडर एज,आर यू किडिंग मी "? लेकिन पापा ने हमें उस समय लड़ने से रोक लिया था। "भई बच्चे की पार्टी प्लान करो तुम लोग,लड़ने झगड़ने को तो पूरी उम्र पड़ी है !" मैं चुप हो गई थी पर जानती थी कि मैं कोई भी निर्णय अपने बच्चों के लिये नहीं ले सकती। अमित की बहन न्यू जर्सी में रहती हैं और आर्यन को वहीं छोड़ा जाने वाला है। ग़ुस्से में मैं उसी समय वहाँ से उठ गई थी। कार स्टार्ट की और बिना कुछ ख़्याल किये अर्चना के घर आ गई।
घर में अर्चना नहीं थीं न ही मिस्टर भट्टाचार्य। बच्चियाँ बोर्डिंग में वापस चली गई थीं। चपरासी ने बैठाते हुए कहा कि माताजी आ रही हैं। कुछ देर में मम्मी प्रशस्ति को गोद में लेकर आयीं, मैंने खड़े हो कर नमस्ते की। "सुखी रहो बेटी, सदा प्रसन्न रहो !" "अरे वाह ये तो जगी हुई है !" मैंने उसे देख कर कहा। तीन महीने की हो गई थी,सिर पर बाल घने से निकल आये थे, नानी की मालिश और तजुर्बे की वजह से थोड़ी गोल मटोल भी हो गई थी, गाल भी चबी हो गये थे कुल मिला कर बहुत cute लग रही थी। गुलाबी ड्रेस में खिली गुलाब की कली, एकदम गुड़िया लग रही थी। मैं उसे निहार रही थी, आँखों के पटल पर वह दृश्य भी था जब एक बेजान,मरियल सी बच्ची जिसकी साँस अक्सर बन्द हो जाती थी,जिसको दुनिया में उसी के प्राणदाता लाना ही नहीं चाहते थे, जिसे ज़िन्दा डिलीवर कराना एक चुनौती बन गया था, जब मेरे हाथों में थी तो एक पल लगा था कि मृत पैदा हुई है.. जिसकी सूरत, शक्ल, काया सभी कुछ साधारण से भी कमतर था। आज वही प्यार, तवज्जो और मेडिकल साइंस की वजह से नायाब कली सी खिल गई थी। मैंने उसे अपनी गोद में ले लिया था और उसने मेरी उँगली अपने छोटे से हाथों में कस के पकड़ ली थी और अब वो मुझे निरन्तर देख रही थी। मेरे सारे दुःख -दर्द हवा हो गये उसी पल और मुझे अचानक स्नो ड्रॉप की याद आई, जो बर्फीले मैदान में जब कोई भी वेजिटेशन नहीं हो सकता तब भी उग आता है और उसका फूल सारी विपरीत परिस्थितियों को शिक़स्त देते हुए खिल पड़ता है। बहार के आगमन का सँकेत देता है और हमें ये प्रेरणा कि चाहे कुछ भी हो हार जाना बेमौत मर जाना है, ज़िंदगी तो डट कर सामना करने का नाम है हर उस बला का जो आपके लिये ख़तरा हो। प्रशस्ति यात्रा ऐसा ही पौधा है, स्नो ड्रॉप है ये जो मुझे जीने का हुनर सिखा रही है! जिसके जन्म में मेरा भी कुछ योगदान रहा था वही आज मेरे जीवन की प्रेरणा श्रोत बन गई है !
क्रमशः
आरती श्रीवास्तव
आरती
ReplyDeleteकमाल की लेखन शैली है जीवन की अभिव्यक्तियों का सजीव और हृदयस्पर्शी चित्रण कला अत्यन्त परिष्कृत रूप में सुस्पष्ट और साधारण शब्दावलियों से युक्त एवम्ए भाषा एकदम महादेवी जी की तरह प्रांजल है ।