Saturday, June 15, 2019

(अध्याय 3)                            

                                              टूटा चाँद !

आर्यन के जन्मदिन की मेहमानों की लिस्ट बन गई थी। उसके दोस्तों के साथ शहर की सभी माननीय हस्तियाँ तो थीं ही, बाहर से भी कई लोग बुलाये गये थे। मेरे अपने मेहमान तो उँगली पर गिनने लायक ही थे। मुझे बच्चों के फँक्शन में बड़ों का इतना बड़ा जमावड़ा समझ में नहीं आता है, लेकिन उससे क्या फ़र्क पड़ना था। घर में कुछ नहीं करना था, सब कुछ कॉन्ट्रैक्ट पर दे दिया गया था और हमें तैयार होके बस शामिल भर हो जाना था। आजकल तो ये आम बात हो गई है लेकिन उस समय इसका प्रचलन नहीं था, वो भी इलाहाबाद जैसे छोटे शहरों में। इसमें मुझे कभी संतोष नहीं मिला, वो जो ख़ुद अपनों के लिये आप प्यार से एक एक सूक्ष्म सजावट,मेन्यू वगैरह का ध्यान रखते हुए कोई पार्टी अरेंज करते हैं न, उसकी बात और तृप्ति ही कुछ और होती है। पर ससुराल में धन से हर सुविधा ख़रीद लेना ही शान समझी जाती थी। ये सही है कि मेरे पास समय की बहुत कमी थी, पर ये तो हर वर्किंग वूमन की कहानी है, मैं अपने घर परिवार के लिये बहुत कुछ करना चाहती थी लेकिन महसूस हुआ कि किसी को पसन्द नहीं, फिर मैंने भी इसपर सोचना छोड़ दिया। छोटे-छोटे पर्सनल टच, जैसे कभी किचेन में कुछ अपने हाथों से पका दिया, कभी कोई स्वेटर ही पति और परिवार के लोगों के लिये बना दिया, कुछ भी अपनी ख़ुशी से घरवालों के लिये कर दिया,ये सब बातें आपको अनोखी ख़ुशी तो देती ही हैं,आपका रिश्ता भी मज़बूत करती हैं। अपनी अपनी सोच है,हमारी परवरिश हमारे विचारों को प्रभावित करती है, क्लास डिफरेंस तो होता ही है। बहरहाल। ..... 
शाम हो गई थी, मेहमानों के आने का समय हो चला था। मास्टर आर्यन पूरे एरिया का फुदक-फुदक कर ज़ायजा ले रहे थे ! नवेली को भी तैयार कर दिया था। आज मैंने अपने लिये आसमानी रंग की शिफॉन की साड़ी निकाली  थी जिस पर सिल्वर ज़री और चाँदी के रंग के ही कुंदन का काम था। हील की सैंडल और खुले हुए बाल, बहुत दिनों बाद ख़ुद को सँवारने में कुछ समय दिया था। साथ में डायमंड का सेट ,ख़ुद पे ही प्यार आ गया ! काम-काज की भागमभाग में इतना टाइम ही नहीं बचता कि श्रिंगार किया जाये। उस दिन तो अमित मुझे हैरानी से देखते रह गए थे। "सम बॉडी इज़ लुकिंग डिफ्रेंट टुडे, उन्होंने हँस के कहा था !
पार्टी शुरू हो चुकी थी, बच्चे अपने ग्रूप में, बड़े अपने अपने ग्रुप में ड्रिंक्स और स्नैक्स एन्जॉय कर रहे थे। मेरी नज़र अर्चना के परिवार को ढूँढ रही थी , ऐसा तो होता नहीं कि वो लोग टाइम पर न पँहुचे हों, क्या बात हो गई, मन कुछ आशंकित हो उठा। 
तभी एक गाड़ी रुकी और कमिश्नर साहब का परिवार उतरा, डी.एम. ,और बाक़ी ज़िला स्तर के अधिकारी प्रोटोकॉल में उनका स्वागत करने बढ़ गये, मेज़बान अमित भी हाथ मिलाने लगे। मैं भी अर्चना और मम्मी की तरफ़ लगभग भागते हुए से लपकी, मेरी गुड़िया सो रही थी। अर्चना ने बताया कि उसे रूटीन शॉट्स लगवाये हैं जिससे उसे तेज़ बुख़ार हो गया है, इसीलिए आने में देर हो गई।  "और आपने इतना इन्सिस्ट किया था इसको साथ लाने के लिये तो इसके बिना तो हमारी हिम्मत नहीं थी यँहा आने की !" मैंने कहा कि "इसे मैं अपने रूम में सुला देती हूँ आराम से सोयेगी और शोर गुल से डिस्टर्ब नहीं होगी।" उसकी आया रजनी थी ही उसके साथ जो कमरे में उसका ख़याल रखेगी। 
हम सभी जगमगाती रात में संगीत का लुत्फ़ उठाते हुए महफ़िल का आनंद उठा रहे थे। बच्चे भाग दौड़ करते हुए अन्दर बाहर कर रहे थे तभी घर के अन्दर से कुछ नौकर भागते हुए आये और बोले कि छोटी बिटिया बिस्तर से गिर गई हैं और उनकी साँस बंद पड़ गई है। हम लोग हड़बड़ा कर अन्दर दौड़े तो देखा रजनी उसे गोद में लिये हिला रही है, बहुत घबराई हुई थी वह भी। "कैसे हुआ ये" लगभग हम सब ने एक साथ ही पूछा। उसे माउथ टू  माउथ दिया तो एक मिनट बाद उसने साँस लेनी शुरू की, अब भी बहुत मुश्किल हो रही थी उसे साँस लेने में, एम्बुलेंस भी आ गई थी तो जल्दी से उसे हॉस्पिटल ले जाया गया।ऑक्सीजन लगाया, रात भर उसे आई सी यू में रखा गया, घर आ कर नौकरों से पता चला कि रजनी बच्ची को छोड़ कर चाट की स्टॉल से पानी के बताशे खाने निकल ली थी और तभी आर्यन रूम से अपना कोई खिलौना, जो उसने वँहा फेंका होगा, उसे लेने गया और खिलौना खींचने में प्रशस्ति जिस बेबी शीट पर सोई थी वह भी उसके हाथों में आ गई और बेचारी फ़र्श पर गिर पड़ी। 
आर्यन सहमा सा एक कोने में छुप कर खड़ा था, उसे डर था कि आज तो उसकी कुटाई होगी। मन तो मेरा यही कर रहा था लेकिन वह भी एक अबोध बालक था, उसने जान बूझ कर ये हिमाक़त तो की नहीं थी लेकिन फिर भी उसकी वजह से नन्हीं प्रशस्ति को कितनी तकलीफ़ उठानी पड़ी। मैंने आर्यन को पास बैठा कर सांत्वना दी कि वो पिटेगा नहीं, पर उसकी इस हरकत से छोटी बेबी की जान भी जा सकती थी। रजनी की ग़ैर ज़िम्मेदारी पर बहुत आक्रोश था,अगले दिन मम्मी ने बताया कि उसे निकाल दिया गया है। जब प्रशस्ति दो दिनों के बाद ठीक हो कर घर आ गई तो मैं,अमित,आर्यन और नवेली उसके घर गये, आर्यन बहुत घबराया था, उसने अर्चना आंटी से सॉरी भी कहा। अर्चना और आशीष जी समझते थे कि नासमझ बच्चे से अनजाने में ये हुआ है और उन्होंने हँस के उसे गोदी में उठा लिया था। हम बच्ची को देखने अन्दर गये, वह इतने ही अरसे में काफ़ी कमज़ोर लग रही थी। उसकी नज़र जब मुझ पर पड़ी तो वो जैसे पहचानने लगी थी, मेरी गोदी में आने के लिए हाथ पैर तेज़ी से फेंकने लगी, मैंने बढ़ के उसे उठा लिया और सीने से चिपका लिया।
दिन पँख लगा कर उड़ते जा रहे थे। काम-काज के बोझ ने मशीन बना दिया था, लेकिन मुझे इस व्यस्तता में आनंद मिलता था। यँहा एक संतोष तो था कि मरीज़ों की ज़िम्मेदारी पूरी मेरी थी और कितनी दुआयें मिलती थीं जब पेचीदे केस मेरे हाथ से ठीक हो जाते थे। मेरा काफी समय इधर ही बीतता था। एक दिन छुट्टी का होता था तो अब मैं अपने बच्चों को लेकर कँही दूर निकल जाती थी इस बात की परवाह किये बग़ैर कि अमित क्या सोचेंगें। हम कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें, लोगों को ज़बरदस्ती ख़ुश नहीं कर सकते इसलिये कम से कम अपने आप को तो ख़ुश रखें। मेरे दोनों बच्चों को बोर्डिंग में रह के पढ़ना तय था, तो मैं ये बचपन के राशन में मिले लम्हों को खोना नहीं चाहती थी। कभी ऐसा भी होता था कि अर्चना अपनी बेटी के साथ हमें जॉइन कर लेती थीं। नवेली को प्रशस्ति बहुत पसँद आने लग गई थी, लड़कियों को छोटे बच्चे अमूमन अच्छे लगते ही हैं, ये उनकी instinct में होता है। अर्चना की मम्मी रिटायर होने के बाद उन्हीं लोगों के साथ रहने लगी थीं, इससे दोनों पति-पत्नी को बहुत सहारा हो गया था। बच्ची को nanny के भरोसे छोड़ने के लिये दिल गवाही नहीं देता था और उनका नेचर ऑफ़ जॉब ऐसा था कि टूर हमेशा करना पड़ता था। अर्चना अपने कैरियर के लिये काफी समर्पित थीं इसलिये लम्बी छुट्टी वो लेना नहीं चाहती थीं।
प्रशस्ति ने चलना और बोलना साल भर की होने से पहले ही शुरू कर दिया था। अब उसकी पहली सालगिरह भी आने वाली थी। कमिश्नर साहब के बँगले पर शानदार पार्टी का आयोजन था। क्रिसमस और उसका जन्मदिन.. साथ-साथ ही पड़ते थे। दोहरी रौनक थी, रौशनी केवल उसके घर में  ही नहीं बल्कि पूरे शहर में थी, या यूँ कहें कि उसका जन्मदिन तो पूरी दुनिया मना रही थी ! उसकी बड़ी बहनें भी आई थीं,winter vacation थी स्कूल में, दोनों अपनी छोटी बहन को बहुत प्यार से कभी गोदी में, कभी हाथ पकड़ के सारे इंतज़ाम का मुआयना करवा रही थीं। देख कर बहुत अच्छा लगा, प्रशस्ति ने लाल और सफ़ेद रँग का टॉप और जैकेट पहना था,ब्लैक जीन्स थी और वह गज़ब की स्मार्ट और सुन्दर लग रही थी। केक कटने के बहुत देर बाद तक पार्टी चलती रही थी। आशीष जी ने सबके सामने प्रशस्ति के जन्म में मेरे योगदान को लेकर एक अच्छी ख़ासी स्पीच दे डाली थी, अर्चना ने मुझे देर तक गले से लगाये रखा और मेरा शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि मेरी वजह से उनकी प्रशस्ति -यात्रा आज एक जीती जागती हक़ीकत है और इतना अनमोल तोहफ़ा उनके पास सलामत है !मैंने कहा था कि "सब ईश्वर की कृपा है और मैं बस एक माध्यम हूँ" लेकिन उनके लिये मैं एक फ़रिश्ता बन गई थी। पार्टी ख़त्म होने पर जब हम बाहर निकलने लगे तब भी प्रशस्ति जगी हुई थी और वह भी आलिया की गोद में बाहर आई हम सबको छोड़ने। आसमान पे चाँद आधा था और उसने पूछा, " चाँद टूटा क्यूँ  ?"उच्चारण एकदम साफ़,कोई तोतलापन नहीं ..... उसका ये सवाल बड़े बड़े लोगों को अचरज में डाल गया। इतनी छोटी बच्ची कितनी गहरी बात बोल गई,हम सब चाँद आधा ही कहते आये हैं, इसको कौतूहल है कि गोल चाँद कैसे टूट गया !बहुत लोगों ने उस दिन आशीष जी और अर्चना को कहा कि आपकी बच्ची जीनियस होगी !
                                                                                                  क्रमशः
                                                                                          आरती श्रीवास्तव

1 comment:

  1. अत्यन्त ललित और मर्मस्पर्शी

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