(अध्याय 8 )
गँगाजी
आज छुट्टी का दिन था, हम लोग हर बार की तरह इत्मिनान से थोड़ा देर से सो कर उठे। सुबह की चाय के साथ मैंने अमित से पूछा कि आज का कोई ख़ास प्रोग्राम तो नहीं है, तो उन्होंने कहा कि आज लंच बाहर करते हैं और उसके बाद कोई मूवी देखने चलते हैं।आजकल अमित मेरे साथ अकेले और कभी पूरी फ़ैमिली के साथ कोई न कोई प्रोग्राम ज़रूर बनाते हैं टाइम स्पेंड करने का।मैंने कहा डन है, कॉलेज के टाइम में मुझे मूवी देखने और आकाशवाणी पे विविध भारती सुनने का बहुत शौक़ था।अब अमित मेरी हर कही-अनकही ख्वाहिशों को पूरा करने में लगे रहते हैं। मैंने कहा कि उसके बाद मुझे अलोपी बाग़ छोड़ दीजियेगा, मम्मा और प्रशस्ति वहीँ रह रही हैं उनके पुश्तैनी घर में। उन्होंने तुरन्त हामी भरी और कहा कि शाम को चेम्बर में नहीं बैठना होता तो वह भी साथ चलते।
मैंने मम्मा-डैडी से भी आग्रह किया कि वो लोग भी हमारे साथ चलें, लेकिन डैडी बोले कि तुम लोग आज जाओ, हम लोग किसी और दिन जॉइन कर लेंगे। मम्मा कहने लगीं कि नवेली को भी छोड़ती जाओ, मैं उसे शॉपिंग करा लाऊँगी लेकिन मैंने कहा कि इस बार हम लोग ले जाते हैं, अगली बार आप ले जाइयेगा। मम्मा मुस्कुराने लगीं। मेरी सास बहुत छोटी छोटी बातों का ध्यान रखती हैं और हमेशा चाहती हैं कि उनके बेटा-बहू कुछ अकेले में टाइम स्पेंड करें जो कई सालों तक हमने नहीं किया। अब तो ख़ैर आदत पड़ चुकी है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। फिर भी जब हम साथ एज़ अ फ़ैमिली समय बिताते हैं तो यक़ीनन मन को ख़ुशी बहुत मिलती है!
आज मन चाह रहा था कि साड़ी पहनी जाये। साड़ी मुझे पसन्द तो बहुत है लेकिन कम ही पहनती हूँ। उसे बाँधने में समय जो बहुत लगता है ! फिर भी आज मूड कर गया। मेरे पास साड़ियाँ एकदम नई सी ही पड़ी हैं, प्लास्टिक बैग्स में करीने से रखी हुई। क्रेप डी शीन की रानी कलर की साड़ी जिसका ब्लैक बॉर्डर है और बॉर्डर पर छोटे छोटे मोर बने हैं, मैंने उठा ली। Iron करवाया और फुल स्लीव्स के शनील के कॉन्ट्रास्ट ब्लाउज़ के साथ पहना। माथे पर बिंदी, खुले बाल, प्लेटफार्म हील की ब्लैक सैंडल्स, थोड़ी सी डार्क लिपस्टिक और ब्लैक crossbody , आज बहुत मन से सालों बाद तैयार हुई मैं! और जब तैयार हो कर बाहर निकली तो मम्मा निहारती ही रह गईं ! बोलीं, "मेरी बहू को आज किसी की नज़र न लग जाये!" अमित बाहर पोर्टिको में वेट कर रहे थे, कोई जूनियर आ गया था किसी इम्पोर्टेन्ट केस में कन्सल्ट करने, उनकी नज़र पड़ी तो उसे हटाना ही भूल गये ! जब उसने मुझे नमस्ते मैम कहा और इजाज़त माँगी तब जाकर उनकी नज़र मुझ पर से हटी! हम लोग कार में बैठे और आज अमित ने ड्राइवर के हाथ से चाभी ले ली और ख़ुद ड्राइवर की सीट पर बैठ गये।
नवेली जो वैसे हमेशा ही अच्छे से तैयार होती है, आज भी हुई थी लेकिन मुझे देख कर अपने डैड से कहने लगी," OMG! Isn't mom looking absolutely stunning dad !" अमित ने तुरन्त कहा," yeah sweety, but you always look like a Princess."
" I know dad !"
हम लोग एल्चिको में लंच करने गये। अमित का पसन्दीदा और इलाहाबाद का बेहतरीन रेस्टोरेंट। फिर एक हिन्दी पिक्चर, नवेली बहुत देखना चाहती थी .....ताल। मुझे भी गाने बहुत पसंद थे इस मूवी के। पिक्चर सबको अच्छी लगी, फिर अमित ने हम दोनों को अलोपी बाग़ ड्रॉप किया। "घर पहुँच कर ड्राइवर के साथ कार भेज दूँगा " उन्होंने कहा। मैंने कहा कि हॉट केस में खाना भी दो लोगों के लिये भिजवा दीजियेगा" . मम्मा घर पर ही मिल गईं जबकि फ़ोन नहीं लगा था उनका, लैंड लाइन ही हुआ करती थी उस समय ज़्यादातर, और वह डेड थी। मैंने नवेली से कहा कि नानी के पैर छुओ, तो उसने बिना मुँह बनाये छू लिये। अमित के यहाँ नाना-नानी, मामा -मामी के पैर छूने का रिवाज़ नहीं था। शायद प्रशस्ति की देखा देखी छू लिये हों। मम्मा ने बहुत आशीर्वाद दिये और अन्दर ले गईं।
"बिटिया रानी पड़ोस में खेलने गई है, उसका हमउम्र लड़का है वहाँ, बस आती ही होगी। उदास थी आज, तो हमने सोचा अपने साथ के बच्चों में हिलेगी मिलेगी तो मन बहल जायेगा। तब तक तुम लोगों के लिये चाय बनाते हैं। " मम्मा ने कहा।
"अरे नहीं, आप बैठिये, चाय पीने की एकदम इच्छा नहीं है, मन होगा तो मैं ख़ुद बना लूँगी। " मैंने उनको रोकते हुए कहा।
फिर भी वो चिप्स, आटे के बिस्किट, मठरी और काजू की बर्फ़ी ले आईं। तब तक प्रशस्ति भी आ गई। हम लोगों को देख कर एकदम ख़ुश हो गई। पहले वो हाथ धोने के लिये अपनी नानी को अन्दर ले गई। फिर आकर बोली "बाहर से घर आके सबसे पहले साबुन से हाथ धोना चाहिये ना, आप एक दिन बोल रही थीं इससे निन्यानबे प्रतिशत बीमारियों से बचाव हो सकता है जो गन्दगी से होती हैं। तब से प्रशस्ति ऐसा करती है। "
"हाँ भई प्रशस्ति, बात तो सही है। तुम ये बताओ निन्यानबे तक काउंटिंग आती है क्या?"
"गिनती तो पाँच सौ तक आती है प्रशस्ति को, हाँ जी। "
"अरे वाह !"
"गुड गर्ल, चलो हम लोग आई स्पाई खेलते हैं। " नवेली ये कहते हुए उसे अन्दर ले गई।
मम्मा बताने लगीं कि फ़ोन ख़राब होने से बेटी दामाद की कोई ख़बर नहीं मिली है। मैंने कहा कि मैं कोशिश करुँगी कल उनसे कॉन्टैक्ट करने का। मम्मा ने बताया कि छटंकी को कोई शास्त्रीय नृत्य सिखाना चाहती हैं कत्थक के अलावा। ढूँढ रही हैं किसी भरतनाट्यम या ओडिसी की गुरु को, बस एक मदद चाहिये हम लोगों से कि शाम को कुछ घंटे के लिये पार्ट टाइम ड्राइवर की व्यवस्था कर दें। मैंने कहा ये तो फ़ौरन हो जायेगा। "लेकिन मम्मा, इतनी छोटी है ये, इतना कुछ एकसाथ करना उसपर बहुत बोझ डालना नहीं हो जायेगा क्या? अर्चना ने बताया था अभी कि बेबी के लिये इंग्लिश और मैथ्स की ट्यूशन लगा रही हैं, फिर वो आपके साथ रोज़ पूजा में, गँगा आरती में जाती है, फिर स्कूल भी जाती है, कुछ समय खेलने कूदने के भी ज़रूरी हैं बच्चों के लिये तो थक जायेगी, इतना कुछ एकसाथ कैसे सीखेगी?"
"अरे नहीं बेटी, इसका एकदम उल्टा है इसके साथ! अनोखी ऊर्जा है इस बच्ची में, इसको व्यस्त रखने से ही उस ऊर्जा को सही दिशा मिलेगी। अब हम तुमसे क्या कहें , तुम तो जानती ही हो , जिस जीव को ये लोग दुनियाँ में लाना ही नहीं चाहते थे, उसमें असाधारण संभावनाएँ भरी हैं प्रभु ने, ऐसा बच्चा हमने आज तक कोई दूसरा नहीं देखा और न शायद देखेंगे। अद्भुत ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देने से विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न होगी ये बच्ची, शायद हम इसे उस चरम तक पँहुचा हुआ देखने को जीवित न रहें , लेकिन अब जब हमारे पास समय की कोई कमी नहीं है तो अपना पूरा पूरा समय बिटिया को गढ़ने में लगाना चाहते हैं। अपने बच्चों के समय न तो असीमित वक़्त ही था न उनमें ऐसी असीमित मानसिक ऊर्जा, कोई तो कारण होगा जो नियति ने इसे गढ़ने की ज़िम्मेदारी हमको सौंपी है। "
मम्मा सही कह रही थीं। बच्ची तो ये अनोखी ही है।किसी भी बात को एक बार सुन ले तो इसके दिमाग़ के कम्प्यूटर में स्टोर हो जाती है। उसे दोबारा बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती, और उसे अपनी तरह से समझ कर इन्टरप्रेट भी इसी उम्र से करने लगी है। हिंदी, इंग्लिश और संस्कृत, तीन तीन भाषाओं को इतनी सहजता से बोलती है, किसी एक से कम न ज़्यादा।ऑफिशियली अभी तीन साल की भी नहीं हुई है। अगले महीने 25 को होगी।
रात हो गई थी, जाड़ों में तो यूँ भी शाम से ही अँधेरा हो जाता है, मम्मा ने कहा कि वो खाना गर्म करने जा रही हैं, हम लोग भी खाना खा लें साथ में, नवेली को भी कल स्कूल जाना होगा। पड़ौस से खाना आया था दोपहर में, बहुत था तो सभी खा सकते हैं। कल से महाराजिन आ जायेगी तो दोनों समय ताज़ा खाना बना करेगा।मैंने कहा कि अरे इस तक़ल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है, वैसे ड्राइवर खाना ले कर आता ही होगा।घर से ताज़ा खाना मँगवाया है। तब तक गोविन्द हॉट केस ले कर आ चुका था। मम्मा बोलीं कि "अब तकल्लुफ़ कौन कर रहा है! चलो सब साथ खाते हैं।" उन्होंने इतने अधिकार से कहा कि मैं ना नहीं कर पाई। मोबाइल साथ नहीं था कि घर में inform कर पाती। वैसे भी घर पे डिनर टाइम अभी नहीं हुआ है तो ऐसा नहीं होगा कि सब लोग वेट करेंगे, तब तक मैं पहुँच जाऊँगी और dessert में ज्वाइन कर लूँगी।
बच्चों को बुलाया गया और हम लोग खाना लगाने लगे। दोनों बच्चियों में कोई बहस हो गई थी शायद, नवेली दौड़ के हमारे पास आई और बोली, "mommy, she says Ganges is not correct to write or pronounce, हमेशा गंगा सही वर्ड है।आप बताइये इंग्लिश में तो Ganges ही लिखते हैं न।"
"मौसी, वोल्गा नदी को हिंदी,फ्रेंच,अंग्रेज़ी सभी भाषाओं में वोल्गा ही लिखते हैं ना, टेम्स को टेम्स और गोमती को गोमती। फिर हम गँगा जी का नाम क्यों बिगाड़ते हैं जब कि जानते हैं कि Ganges अंग्रेज़ों का गलत शब्द है। पता है उन्होंने ऐसा नाम क्यों रखा? क्योंकि गँगा जी को सब लोग गँगाजी ही पुकारते थे आदर से , तो उन्हें लगा नदी का नाम ही गंगाजी है और उसे वो गैन्ग्जे पुकारने लगे जो धीरे धीरे Ganges हो गया, लेकिन नदी तो गँगा ही है न। "
मैं साइंस की स्टूडेंट रही हूँ इसलिये मुझे इसके बारे में ये सब नहीं पता था। मम्मा ने नवेली को भाषा कैसे बदलती है और नई होती रहती है, ये बताया और कहा कि Ganges नाम इसी तरह पड़ा, लेकिन इंग्लिश में भी गँगा को गँगा ही लिखा जाना चाहिये और ये बात वह अपनी टीचर को भी एक्सप्लेन कर सकती है। नवेली कुछ असहज हो गई थी अपने से छोटी लड़की द्वारा करेक्ट किये जाने से, लेकिन फिर नॉर्मल हो गई ये देख के कि मुझे भी ये नहीं पता था। मैंने उसे समझाया कि सीखने सिखाने में छोटा बड़ा कभी नहीं देखना या सोचना चाहिये, ये किसी से भी किसी उम्र में सीखा जा सकता है।
पूड़ी आलू गोभी , चिकेन क़ोरमा, मटर पुलाव और बथुए का रायता, ये आया था खाने में। बिरजू काका ने जल्दी में ये बनवाया होगा और क़ोरमा डिनर में पहले से बन रहा होगा। मां और प्रशस्ति ने मंत्र पढ़ा, हम दोनों माँ बेटी ने भी हाथ जोड़े रखे और प्रार्थना के बाद हमने खाना शुरू किया। प्रशस्ति ने चिकेन छोड़ के सब कुछ थोड़ा थोड़ा लिया और प्लेट में कुछ नहीं छोड़ा। उतना ही लेती थी जितना खा सके। उसकी प्लेट खाना ख़त्म करने के बाद भी एकदम साफ़, जैसे किसी ने इसमें कुछ खाया ही न हो! अन्न को वेस्ट करना उसे बिलकुल मंज़ूर नहीं है।
खाना खा के हम लोग चलने लगे तो प्रशस्ति दौड़ के नवेली से चिपक गई और बोली," दीदी, आप प्रशस्ति से गुस्सा तो नहीं?" नवेली ने हँस के उसे गोद में उठा लिया और कहा, "नॉट एट ऑल!" फिर छटंकी मेरे पास आई और बोली," मौसी, आप प्रशस्ति के जन्मदिन से पहले भी आइयेगा ना !" मेरे हाँ कहने पर ख़ुश हो गई और हाथ जोड़ कर बोली शुभरात्रि।
क्रमशः। ......
आरती श्रीवास्तव