Monday, June 28, 2021

 (अध्याय 8 )

                                 गँगाजी

आज छुट्टी का दिन था, हम लोग हर बार की तरह इत्मिनान से थोड़ा देर से सो कर उठे। सुबह की चाय के साथ मैंने अमित से पूछा कि आज का कोई ख़ास प्रोग्राम तो नहीं है, तो उन्होंने कहा कि आज लंच बाहर करते हैं और उसके बाद कोई मूवी देखने चलते हैं।आजकल अमित मेरे साथ अकेले और कभी पूरी फ़ैमिली के साथ कोई न कोई प्रोग्राम ज़रूर बनाते हैं टाइम स्पेंड करने का।मैंने कहा डन है, कॉलेज के टाइम में मुझे मूवी देखने और आकाशवाणी पे विविध भारती सुनने का बहुत शौक़ था।अब अमित मेरी हर कही-अनकही ख्वाहिशों को पूरा करने में लगे रहते हैं। मैंने कहा कि उसके बाद मुझे अलोपी बाग़ छोड़ दीजियेगा, मम्मा और प्रशस्ति वहीँ रह रही हैं उनके पुश्तैनी घर में। उन्होंने तुरन्त हामी भरी और कहा कि शाम को चेम्बर में नहीं बैठना होता तो वह भी साथ चलते। 

मैंने मम्मा-डैडी से भी आग्रह किया कि वो लोग भी हमारे साथ चलें, लेकिन डैडी बोले कि तुम लोग आज जाओ, हम लोग किसी और दिन जॉइन कर लेंगे। मम्मा कहने लगीं कि नवेली को भी छोड़ती जाओ, मैं  उसे शॉपिंग करा लाऊँगी लेकिन मैंने कहा कि इस बार हम लोग ले जाते हैं, अगली बार आप ले जाइयेगा। मम्मा मुस्कुराने लगीं। मेरी सास बहुत छोटी छोटी बातों का ध्यान रखती हैं और हमेशा चाहती हैं कि उनके बेटा-बहू कुछ अकेले में टाइम स्पेंड करें जो कई सालों तक हमने नहीं किया। अब  तो ख़ैर  आदत पड़ चुकी है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। फिर भी जब हम साथ एज़ अ फ़ैमिली समय बिताते हैं तो यक़ीनन मन को ख़ुशी बहुत मिलती है!

आज मन चाह रहा था कि साड़ी पहनी जाये। साड़ी मुझे पसन्द तो बहुत है लेकिन कम ही पहनती हूँ। उसे बाँधने में समय जो बहुत लगता है ! फिर भी आज मूड कर गया। मेरे पास साड़ियाँ एकदम नई सी ही पड़ी हैं, प्लास्टिक बैग्स में करीने से रखी हुई। क्रेप डी शीन की रानी कलर की साड़ी जिसका ब्लैक बॉर्डर है और बॉर्डर पर छोटे छोटे मोर बने हैं, मैंने उठा ली। Iron करवाया और फुल स्लीव्स के शनील के कॉन्ट्रास्ट ब्लाउज़ के साथ पहना। माथे पर बिंदी, खुले बाल, प्लेटफार्म हील की ब्लैक सैंडल्स, थोड़ी सी डार्क लिपस्टिक और ब्लैक crossbody , आज बहुत मन से सालों बाद तैयार हुई मैं! और जब तैयार हो कर बाहर निकली तो मम्मा निहारती ही रह गईं ! बोलीं, "मेरी बहू को आज किसी की नज़र न लग जाये!" अमित बाहर पोर्टिको में वेट कर रहे थे, कोई जूनियर आ गया था किसी इम्पोर्टेन्ट केस में कन्सल्ट करने, उनकी नज़र पड़ी तो उसे हटाना ही भूल गये ! जब उसने मुझे नमस्ते मैम कहा और इजाज़त माँगी तब जाकर उनकी नज़र मुझ पर से हटी! हम लोग कार में बैठे और आज अमित ने ड्राइवर के हाथ से चाभी ले ली और ख़ुद ड्राइवर की सीट पर बैठ गये। 

नवेली जो वैसे हमेशा ही अच्छे से तैयार होती है, आज भी हुई थी लेकिन मुझे देख कर अपने डैड से कहने लगी," OMG! Isn't mom looking absolutely stunning dad !" अमित ने तुरन्त कहा," yeah sweety, but you always look like a  Princess." 

" I know dad !"

हम लोग एल्चिको में लंच करने गये। अमित का पसन्दीदा और इलाहाबाद का बेहतरीन रेस्टोरेंट। फिर एक हिन्दी पिक्चर, नवेली बहुत देखना चाहती थी .....ताल। मुझे भी गाने बहुत पसंद थे इस मूवी के। पिक्चर सबको अच्छी लगी, फिर अमित ने हम दोनों को अलोपी बाग़ ड्रॉप किया। "घर पहुँच कर ड्राइवर के साथ कार भेज दूँगा " उन्होंने कहा। मैंने कहा कि हॉट केस में खाना भी दो लोगों के लिये भिजवा दीजियेगा" . मम्मा घर पर ही मिल गईं जबकि फ़ोन नहीं लगा था उनका, लैंड लाइन ही हुआ करती थी उस समय ज़्यादातर, और वह डेड थी। मैंने नवेली से कहा कि नानी के पैर छुओ, तो उसने बिना मुँह बनाये छू लिये। अमित के यहाँ नाना-नानी, मामा -मामी के पैर छूने का रिवाज़ नहीं था। शायद प्रशस्ति की देखा देखी छू लिये हों। मम्मा ने बहुत आशीर्वाद दिये और अन्दर ले गईं। 

"बिटिया रानी पड़ोस में खेलने गई है, उसका हमउम्र लड़का है वहाँ, बस आती ही होगी। उदास थी आज, तो हमने सोचा अपने साथ के बच्चों में हिलेगी मिलेगी तो मन बहल जायेगा। तब तक तुम लोगों के लिये चाय बनाते हैं। " मम्मा ने कहा। 

"अरे नहीं, आप बैठिये, चाय पीने की एकदम इच्छा नहीं है, मन होगा तो मैं ख़ुद बना लूँगी। " मैंने उनको रोकते हुए कहा। 

फिर भी वो चिप्स, आटे के बिस्किट, मठरी और काजू की बर्फ़ी ले आईं। तब तक प्रशस्ति भी आ गई। हम लोगों को देख कर एकदम ख़ुश हो गई। पहले वो हाथ धोने के लिये अपनी नानी को अन्दर ले गई। फिर आकर बोली "बाहर से घर आके सबसे पहले साबुन से हाथ धोना चाहिये ना, आप एक दिन बोल रही थीं इससे निन्यानबे प्रतिशत बीमारियों से बचाव हो सकता है जो गन्दगी से होती हैं। तब से प्रशस्ति ऐसा करती है। "

"हाँ भई प्रशस्ति, बात तो सही है। तुम ये बताओ निन्यानबे तक काउंटिंग आती है क्या?"

"गिनती तो पाँच सौ तक आती है प्रशस्ति को, हाँ जी। "

"अरे वाह !"

"गुड गर्ल, चलो हम लोग आई स्पाई खेलते हैं। " नवेली ये कहते हुए उसे अन्दर ले गई।

 मम्मा बताने लगीं कि फ़ोन ख़राब होने से बेटी दामाद की कोई ख़बर नहीं मिली है। मैंने कहा कि मैं कोशिश करुँगी कल उनसे कॉन्टैक्ट करने का। मम्मा ने बताया कि छटंकी को कोई शास्त्रीय नृत्य सिखाना चाहती हैं कत्थक के अलावा। ढूँढ रही हैं किसी भरतनाट्यम या ओडिसी की गुरु को, बस एक मदद चाहिये हम लोगों से कि शाम को कुछ घंटे के लिये पार्ट टाइम ड्राइवर की व्यवस्था कर दें। मैंने कहा ये तो फ़ौरन हो जायेगा। "लेकिन मम्मा, इतनी छोटी है ये, इतना कुछ एकसाथ करना उसपर बहुत बोझ डालना नहीं हो जायेगा क्या? अर्चना ने बताया था अभी कि बेबी के लिये इंग्लिश और मैथ्स की ट्यूशन लगा रही हैं, फिर वो आपके साथ रोज़ पूजा में, गँगा आरती में जाती है, फिर स्कूल भी जाती है, कुछ समय खेलने कूदने के भी ज़रूरी हैं बच्चों के लिये तो थक जायेगी, इतना कुछ एकसाथ कैसे सीखेगी?" 

"अरे नहीं बेटी, इसका एकदम उल्टा है इसके साथ! अनोखी ऊर्जा है इस बच्ची में, इसको व्यस्त रखने से ही उस ऊर्जा को सही दिशा मिलेगी। अब हम तुमसे क्या कहें , तुम तो जानती ही हो , जिस जीव को ये लोग दुनियाँ में लाना ही नहीं चाहते थे, उसमें असाधारण संभावनाएँ भरी हैं प्रभु ने, ऐसा बच्चा हमने आज तक कोई दूसरा नहीं देखा और न शायद देखेंगे। अद्भुत ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देने से विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न होगी ये बच्ची, शायद हम इसे उस चरम तक पँहुचा हुआ देखने को जीवित न रहें , लेकिन अब जब हमारे पास समय की कोई कमी नहीं है तो अपना पूरा पूरा समय बिटिया को गढ़ने में लगाना चाहते हैं। अपने बच्चों के समय न तो असीमित वक़्त ही था न उनमें ऐसी असीमित मानसिक ऊर्जा, कोई तो कारण होगा जो नियति ने इसे गढ़ने की ज़िम्मेदारी हमको सौंपी है। " 

 मम्मा सही कह रही थीं। बच्ची तो ये अनोखी ही है।किसी भी बात को एक बार सुन ले तो इसके दिमाग़ के कम्प्यूटर में स्टोर हो जाती है। उसे दोबारा बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती, और उसे अपनी तरह से समझ कर इन्टरप्रेट भी इसी उम्र से करने लगी है। हिंदी, इंग्लिश और संस्कृत, तीन तीन भाषाओं को इतनी सहजता से बोलती है, किसी एक से कम न ज़्यादा।ऑफिशियली अभी तीन साल की भी नहीं हुई है। अगले महीने 25 को होगी। 

रात हो गई थी, जाड़ों में तो यूँ भी शाम से ही अँधेरा हो जाता है, मम्मा ने कहा कि वो खाना गर्म करने जा रही हैं, हम लोग भी खाना खा लें साथ में, नवेली को भी कल स्कूल जाना होगा। पड़ौस से खाना आया था दोपहर में, बहुत था तो सभी खा सकते हैं। कल से महाराजिन आ जायेगी तो दोनों समय ताज़ा खाना बना करेगा।मैंने कहा कि अरे इस तक़ल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है, वैसे ड्राइवर खाना ले कर आता ही होगा।घर से ताज़ा खाना मँगवाया है। तब तक गोविन्द हॉट केस ले कर आ चुका था। मम्मा बोलीं कि "अब तकल्लुफ़ कौन कर रहा है! चलो सब साथ खाते हैं।" उन्होंने इतने अधिकार से कहा कि मैं ना नहीं कर पाई। मोबाइल साथ नहीं था कि घर में inform कर पाती। वैसे भी घर पे डिनर टाइम अभी नहीं हुआ है तो ऐसा नहीं होगा कि सब लोग वेट करेंगे, तब तक मैं पहुँच जाऊँगी और dessert में ज्वाइन कर लूँगी। 

बच्चों को बुलाया गया और हम लोग खाना लगाने लगे। दोनों बच्चियों में कोई बहस हो गई थी शायद, नवेली दौड़ के हमारे पास आई और बोली, "mommy, she says Ganges is not correct to write or pronounce, हमेशा गंगा सही वर्ड है।आप बताइये इंग्लिश में तो Ganges ही लिखते हैं न।"

"मौसी, वोल्गा नदी को हिंदी,फ्रेंच,अंग्रेज़ी सभी भाषाओं में वोल्गा ही लिखते हैं ना, टेम्स को टेम्स और गोमती को गोमती। फिर हम गँगा जी का नाम क्यों बिगाड़ते हैं जब कि जानते हैं कि Ganges अंग्रेज़ों का गलत शब्द है। पता है उन्होंने ऐसा नाम क्यों रखा? क्योंकि गँगा जी को सब लोग गँगाजी ही पुकारते थे आदर से , तो उन्हें लगा नदी का नाम ही गंगाजी है और उसे वो गैन्ग्जे पुकारने लगे जो धीरे धीरे Ganges हो गया, लेकिन नदी तो गँगा ही है न। "

मैं साइंस की स्टूडेंट रही हूँ इसलिये मुझे इसके बारे में ये सब नहीं पता था। मम्मा ने नवेली को भाषा कैसे बदलती है और नई होती रहती है, ये बताया और कहा कि Ganges नाम इसी तरह पड़ा, लेकिन इंग्लिश में भी गँगा को गँगा ही लिखा जाना चाहिये और ये बात वह अपनी टीचर को भी एक्सप्लेन कर सकती है। नवेली कुछ असहज हो गई थी अपने से छोटी लड़की द्वारा करेक्ट किये जाने से, लेकिन फिर नॉर्मल हो गई ये देख के कि मुझे भी ये नहीं पता था। मैंने उसे समझाया कि सीखने सिखाने में छोटा बड़ा कभी नहीं देखना या सोचना चाहिये, ये किसी से भी किसी उम्र में सीखा जा सकता है। 

पूड़ी आलू गोभी , चिकेन क़ोरमा, मटर पुलाव और बथुए का रायता, ये आया था खाने में। बिरजू काका ने जल्दी में ये बनवाया होगा और क़ोरमा डिनर में पहले से बन रहा होगा। मां और प्रशस्ति ने मंत्र पढ़ा, हम दोनों माँ बेटी ने भी हाथ जोड़े रखे और प्रार्थना के बाद हमने खाना शुरू किया। प्रशस्ति ने चिकेन छोड़ के सब कुछ थोड़ा थोड़ा लिया और प्लेट में कुछ नहीं छोड़ा। उतना ही लेती थी जितना खा सके। उसकी प्लेट खाना ख़त्म करने के बाद भी एकदम साफ़, जैसे किसी ने इसमें कुछ खाया ही न हो! अन्न को वेस्ट करना उसे बिलकुल मंज़ूर नहीं है। 

खाना खा के हम लोग चलने लगे तो प्रशस्ति दौड़ के नवेली से चिपक गई और बोली," दीदी, आप प्रशस्ति से गुस्सा तो नहीं?" नवेली ने हँस के उसे गोद में उठा लिया और कहा, "नॉट एट ऑल!" फिर छटंकी मेरे पास आई और बोली," मौसी, आप प्रशस्ति के जन्मदिन से पहले भी आइयेगा ना !" मेरे हाँ कहने पर ख़ुश हो गई और हाथ जोड़ कर बोली शुभरात्रि। 

                                                                                           क्रमशः। ......

                                                                                    आरती श्रीवास्तव

Wednesday, June 23, 2021

 (अध्याय 7 )

                                               ग्रेवी पिर गई!

सोचा था कि Saturday को दोपहर में एक चक्कर अर्चना के घर लगा लूँगी, उनको आज मूव करना था, ट्रक में लोडिंग हो रही होगी। लेकिन एक बहुत कॉम्प्लिकेटेड केस आ गया जिसमें फ़ौरन सी-सेक्शन करना पड़ा।आठवाँ महीना था, हमारे पास आते-आते मरीज़ की हालत एकदम बिगड़ चुकी थी, बेबी की तो premature death हो गई थी, माँ भी ख़तरे में थी, बॉडी में ज़हर काफ़ी फ़ैल गया था, किसी तरह से उसकी जान बचाई। मरीज़ के घरवाले बहुत insensitive थे, घर में बेचारी बहू स्लिप हो के गिर पड़ी सुबह सुबह, और किसी ने भी उसकी चीख़ नहीं सुनी, बेख़बर इत्मिनान से सोते रहे। जब आराम से सो कर उठे तब तक उसका शरीर नीला पड़ चुका था। यहाँ लाये तो बचाना मुश्किल था। ईश्वर की कृपा रही कि माँ की जान बच गई। अजन्मा बच्चा लड़का था जो ज़हर फैलने से एकदम नीला हो गया था, लड़के के मोह में पूरा परिवार दहाड़ें मार मार कर रोने लगा। पति को ये दुःख ज़्यादा था कि लड़का मर गया, लेकिन बीवी को टाइम पर हेल्प न करने का कोई मलाल नहीं। कमरे से लगे हुए बाथरूम में स्लिप होने के बाद बहुत चिल्लाई थी पेशेंट, लेकिन मजाल किसी के कानों में जूं भी रेंगी हो। सास अलग अपना रोना लिये बैठी थी कि बहू थोड़ा एहतियात करती तो पोता बच जाता। मुझे खीज होने लगी इन लोगों के रवैये से, शान्ति की तलाश में मैं अपने चेम्बर में बैठ गई। लेकिन अभी बैठी ही थी कि जनरल वार्ड से नर्स दौड़ी-दौड़ी आई कि देर रात में जिस लड़की की डिलीवरी हुई थी, उसकी हालत नाज़ुक़ हो गई है, काफी सारा ख़ून बह गया है और वो बेहोश हो गई है। 

तुरन्त मैं ऑपरेशन थिएटर में चली गई। कल आधी रात में इस लड़की बबिता की डिलीवरी डॉ दिव्या ने कराई थी, रात की ड्यूटी उनकी थी। पहली डिलीवरी थी, ठीक ही था सब कुछ, सुबह नर्स ने जब वॉक के लिये उठने को कहा, तो वह बहुत कमज़ोरी महसूस कर रही थी । उसने कहा कि उठा नहीं जा रहा है तो नर्स थोड़ा व्यंग से हँसी। फिर "नख़रे बहुत हैं" बुदबुदाते हुए चली गई। बबिता की मम्मी ने बताया। फिर दोपहर में जब खाने के लिये उठाया गया तो वह बाथरूम जाने के लिये उठी और वहीँ फर्श पर गिर पड़ी और फैल गया हर तरफ़ ख़ून ही ख़ून। उसे इन्टर्नल ब्लीडिंग हो रही थी इसी वजह से कमज़ोरी इतनी थी। तुरन्त सर्जरी हुई और उसकी जान बच गई। डॉ दिव्या और नर्स दोनों की कोताही थी, बड़ी दया है भगवान की कि उसकी जान बच गई। मैं उस अदृश्य शक्ति, जिसे अनेकों नामों से पुकारते हैं, को बहुत मानती हूँ। मानव शरीर के बारे में यानि anatomy जब हम पढ़ रहे थे, तभी से उस मास्टर प्लानर के बारे में सोच के हैरत होती थी कि कितनी बारीक़ी से उसने ये रचना की है जिसमें हर अंग अपनी जगह पर पर्फेक्ट्ली फ़िट है!हमारा साइंस कितनी भी तरक़्क़ी कर ले, ऐसी रचना नहीं कर पायेगा!

नर्स को बुला के वॉर्निंग दी कि आगे से ऐसा अमानवीय रवैया मेरे यहाँ नहीं चलेगा।ये नई रिक्रूट थी शायद इसलिये हमारे इंस्टीटूयशन के हाई स्टैंडर्ड्स को नहीं समझ पाई। मरीज़ों के प्रति दया का भाव तो नर्सिंग की पहली ट्रेनिंग होती है, वही उसने भुला दिया। डॉ दिव्या की भी क्लास लेनी है, cesarean करने में ऐसी लापरवाही कैसे हुई उनसे? उन्हें तो लगभग एक साल होने वाले हैं यहाँ। मरीज़ की जान भी जा सकती थी। इन्हीं सब बातों में शाम हो गई, आज तो लंच भी स्किप हो गया। अब शाम के पेशेंट्स आने लगे हैं, उन्हें देखते देखते नौ बज जायेंगे और तब तक कमिश्नर साहब की फ़ैमिली यहाँ से जा चुकी होगी। इस अफ़रा तफ़री में ज़रा टाइम नहीं मिला अर्चना को फ़ोन तक करने का, पता नहीं क्यों आज ही ये सब होना था। ख़ैर, काम तो काम ही है, वर्क इज़ वरशिप. 

घर पर सभी डिनर पर मेरा ही वेट कर रहे थे। मुझे बहुत थकान हो रही थी, खैर फ्रेश हो कर मैंने सबको जॉइन किया। मेरा उतरा और लम्बा चेहरा देख कर अमित और मम्मा ने पूछा कि सब ख़ैरियत तो है न, मैंने सिर हिला के हाँ में जवाब दिया। बोलने की जैसे एनर्जी ही नहीं बची थी। सभी लोगों के लिये नॉन वेज बना था, अवधी बिरयानी और शामी क़बाब। साथ में प्याज़ का रायता। मेरे लिये मेरा पसंदीदा मशरुम पुलाव पापड़ और रायते के साथ। शाही टुकड़ा मीठे में। खाना खा के थोड़ी जान में जान आई। साढ़े दस बजे रात में आर्यन से याहू पर वीडियो चैटिंग तय थी, टाइम पहले से सेट क्योँकि अक्सर वह वीकेंड में नहीं मिलता था। ख़ैर आजकल तो बहुत ठण्ड थी वहाँ , उतना घूमना तो नहीं हो रहा था फिर भी हम लोग टाइम फ़िक्स करके रखते थे। 

खाना ख़तम करते ही साढ़े दस बज गये। हम लोग अमित के चेम्बर में आ गये चैटिंग के लिये, डेस्क टॉप वहीँ था। आज की शाम और संडे की सुबह अमित clients से नहीं मिलते हैं, ऑफ रखते हैं तो वहाँ प्राइवेसी थी। वेब कैम ऑन किया गया। तब के कम्प्यूटर्स में इन बिल्ट कैमरा नहीं होता था। वहाँ सुबह के नौ बज रहे होँगे। आर्यन सुबह उठ कर ही शावर लेके रेडी हो जाता है। आस्था के साथ वह दूसरी तरफ़ था। मेरा बेटा पोकेमॉन की टीशर्ट के ऊपर plaid ब्लैक एंड ग्रे ओपन बटन शर्ट में गज़ब का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था। उसने उधर से सबको hay, how are you guys  कहा। हमने लगभग एक साथ ग्रेट कह कर जवाब दिया। सबसे पहले मम्मा डैडी से उसकी बात हुई, फिर वो लोग सोने चले गये। फिर नवेली और आर्यन की ढेर सारी बातें जिसमें स्कूल, स्पोर्ट्स, कार्टून और फ़ास्ट फ़ूड अहम् थे। फिर अमित और मैं रह गये बात करने को। अमित भी इंग्लिश में ही बात करते थे। उधर से आर्यन की भी fluent अमेरिकन इंग्लिश। बाप बेटे का टॉपिक भी गज़ब!

 "yes buddy, How the girls of your class pronounce your name ?" 

 "ओह डैड, दे काल मी एरी। आय आलरेडी टोल्ड देम टु काल मी बाय माय फ़ुल नेम बट दे डोन्ट लिसेन। " 

"No worries dude, keep trying. How many girl friends you do have?"

"वॉट द। ......! आर यू किडिंग मी ! आय डोंट टाक ठु द गरल्स ! वी गायस प्ले सेपरेट।"

"OK . got You !" Now talk to Mom, she is staring me !And take care buddy , love you ."

मैंने मुस्कुरा के देखा। "कैसे हो बेटा ?"

"हां मैं टीक, हाउ यू हैव बीन मॉम?" 

हम दोनों में ये तय हुआ था कि अपनी भाषा हिन्दी में बात किया करेंगें। क्योंकि इंग्लिश तो वहाँ हमेशा ही बोली जायेगी, हिन्दी वह भूल न जाये। आर्यन हिन्दी के कई अक्षर सही से नहीं बोल पाता है! हिन्दी बोली में कच्चा है, लेकिन कोशिश पूरी करता है।

"मैं अच्छी हूँ, तुम्हें बहुत मिस करती हूँ बेटा ! तुम्हारी छुट्टियाँ कैसी जा रही हैं?"   Thanksgiving की क़रीब 5 दिनों की छुट्टियाँ चल रही हैं वहाँ पर इन दिनों। 

"टीक जा रही। यू नो बुआ Turkey बनाये, उसपे मेरेकू ग्रेवी पोरने को बोले, सारी ग्रेवी फ़्लोर पे पिर गई। देन आई .. फ़्लोर वाइप किये। "  मेरी हँसी रुकी ही नहीं इस बात पर! वह कुछ शरमा गया। असल में pour शब्द का हिन्दीकरण कर चुका था जो बहुत मनोरंजक था! 

"मॉम, आज की कानी (कहानी) सुनाइए, राम जी की या बेबी कृष्ना की। "

मैंने उसे भगवान राम के अपने पिता की अनकही आज्ञा के परिणामस्वरूप वन जाने की कहानी सुनाई और हमारी बातें ख़तम होते-होते काफ़ी रात हो चली थी। जब मैं अपने रूम में आई तो अमित जाग रहे थे और कोई बुक पढ़ रहे थे। "माँ बेटे में ख़ूब देर तक बात हुई एज़ युशुअल। " hmm कहा मैंने और तुरन्त ही नींद ने अपनी आग़ोश में ले लिया!

                                                                                                क्रमशः ....... 

                                                                                         आरती श्रीवास्तव

 

Wednesday, June 16, 2021

 (अध्याय 6 )

                              दावत

सुबह जब नाश्ते के लिये सब लोग इकठ्ठा हुए तो सबके पास अपनी अपनी ढेरों बातें थीं। हम सब कुछ देर से उठे थे, नवेली अभी नहीं लौटी थी, लंच के बाद उसे पिक करना था।आज Sunday था इसलिये ब्रंच लाज़मी था। वैसे तो रोज़ हमारे यहाँ कॉन्टिनेंटल ब्रेकफास्ट होता है, लेकिन Sunday को बिरजू काका मेरे लिये देसी नाश्ता बनाते हैं। ऐसे ही बातों बातों में कुछ साल पहले मैंने उनसे कहा था कि मुझे पूड़ी आलू, जलेबी समोसा जैसी चीज़ें संडे को नाश्ते में पसन्द हैं और मायके में हमारे यहाँ ऐसा नाश्ता छुट्टियों में ज़रूर बनता था। फिर क्या था, बिरजू काका हर संडे मेरे लिये ऐसा कुछ ज़रूर बनाते हैं! और अब तो अमित भी ये नाश्ता पसंद से करने लगे हैं। मम्मा डैडी को तो ये सब पसंद नहीं है, लेकिन थोड़ा बहुत ले लेते हैं इसमें से भी। तो आज उन्होंने चीज़ एंड कॉर्न सैंडविचेज़ , रवा इडली और टमाटर की चटनी और गोभी का पराठा और हरी चटनी बनाई है, जो बहुत स्वादिष्ट है। अमित चटखारे ले कर खा रहे थे तो मम्मा ने चुटकी ली, "तुम्हें कैसे  इतनी तीखी चटनी पसंद आने लगी भई ?" अमित ने झटपट जवाब दिया, "जैसे डैड को हिंदी classics पसंद आने लगीं मम्मा !" डैडी ठहाके लगा के हँस पड़े और मम्मा हँस कर बोलीं, " बहुत सही जा रहे हो बेटा, इसी रास्ते को पकड़े रहना!"

 डैडी ने कल की पिक्चर के बारे में कहा कि बहुत रोने पीटने वाली मूवी थी, मीना कुमारी की मूवी बहुत grim थी और उसपर तुम्हारी मम्मा सुबक सुबक कर  रो रही थीं। "Would someone tell her that it is only happening on screen, not actually! My goodness!" मम्मा बोलीं कि उन्हें भी पता है इतना तो! 

     अमित ने मुझसे कल रात के बारे में पूछा। "So, when are they moving ? Let us invite them for dinner dear . " मैंने सारी बातें बताईं और छटंकी की वो बातें सुन के तो सभी लोग हैरान रह गये। किसी को विश्वास ही जैसे न हो रहा हो कि इतनी छोटी सी बच्ची ऐसे भी बोल सकती है! बड़े बड़े संतों की वाणी रटना तक इतने छोटे बच्चे के लिये संभव नहीं है, और उसपर उसे आत्मसात करना, इतना समझ जाना कि अपनी उपमाएँ दे दी जायें, ये तो एकदम असम्भव सा है।वो जो उसने पानी के न टूटने की बात कही, वो तो आज तक किसी किताब में न पढ़ी किसी ने, न ही सुनी!

 उन लोगों को एक दो दिन में डिनर पर invite करने की बात तय हो गई, फिर हम सभी अपने - अपने रूटीन में बिज़ी हो गये।

                               रात में फ़ोन करके मैंने अर्चना को सपरिवार खाने पर invite किया। Wednesday को Dinner पर आने के लिये वो राज़ी हो गईं। बिरजू काका से मैंने बता दिया कि सारा खाना वह अपनी निगरानी में बनवायें। Menu में एक मछली की डिश ज़रूर रखें, आशीष जी को बहुत पसन्द है। और हाँ, जो चिकेन पैटी बर्गर मैंने U.S. से लौटने के बाद सिखाया है, उसे बच्चों के लिये बनाना न भूलें। उस समय के इलाहाबाद में ये एकदम नहीं available था, बिल्कुल exotic dish थी, और छटंकी को मज़ा आ जायेगा खा कर, नवेली को तो बहुत पसन्द है। 

नियत दिन और नियत समय पर कमिश्नर साहब की फैमिली हमारे यहाँ आ गई। नवम्बर का अंतिम हफ़्ता था, जाड़े की आमद हो चुकी थी। आज शाम से ही घने बादल छाये हैं, इसलिये सर्दी कुछ कम है, सभी लोग comfortably dressed up हैं। कमिश्नर साहब अपने सूट में और अर्चना काही रंग की फिरन में, जिसमें बहुत ख़ूबसूरत कश्मीरी कढ़ाई हुई थी, बहुत जँच रहे थे। मम्मा ने ऑफ़ वाइट कलर की सिल्क की साड़ी जिसका नेवी ब्लू बॉर्डर था, पहनी थी और उसपर पश्मीना की ब्लू शाल ओढ़ रखी थी। और हमारी प्यारी छटंकी, उसका तो जलवा ही निराला था। वैसे तो वो इतनी प्यारी थी कि कुछ भी पहन ले, लाखों करोड़ों में अलग से ही दिख जाये ! और फिर जब उसे तैयार कर दिया जाये तब तो अद्भुत छटा बिखेरती थी। उसने फेडेड पिंक और पीच कलर के मिक्स कलर की ruffle वाली स्कर्ट पहनी थी जिसका टॉप ब्लैक कलर का था और जिसपे वाइट कलर के बड़े बड़े पोल्का सर्कल्स बने हुए थे। अन्दर ब्लैक highneck स्कीवी और पैरों में वाइट स्टॉकिंग्स और ब्लैक फ्लैट बेले शूज़। दो छोटी छोटी पोनीज़ वाले उसके घूँघर वाले बाल! नज़र उसपे से हट ही नहीं रही थी! हम लोगों ने एक दूसरे का अभिवादन किया। अन्दर ड्रॉइंग रूम में आ कर उसने लपक कर मम्मा डैडी के पैर छू लिये ! डैडी ने उसे गोदी में उठाते हुए कहा, " अरे बेटा , ये क्या कर रही हो?" उसने तुरन्त जवाब दिया," नानी माँ ने बोला था बाबा साहब-दादी माँ मिलेंगें वहाँ, तो इसीलिये चरण स्पर्श कर लिया। " मम्मा ने बताया कि आजकल रामायण का वीडियो कैसेट देख रही हैं वो, उसी में से देख कर बच्ची रोज़ सुबह सबका पैर छूना सीख गई है। मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया कि कितने अच्छे सँस्कार हैं इसके, नवेली और उसकी दादी ने मुझे तिरछी नज़र से देखा। हम सास बहू दो डिफरेंट क्लास से आती हैं, वैसे तो मेरी सास कोई सास वाली हरकत नहीं करती हैं, बेटी की तरह ही प्यार भी करती हैं, लेकिन मेरी मिडिल क्लास वाली सोच उन्हें गाहे बगाहे हैरान करती ही रहती है!

       हम लोग बातें करने लगे। डैडी, अमित और आशीष जी पॉलिटिक्स पर गरमा गरम बहस में मशगूल, दोनों मम्मा मौसम, खान-पान वग़ैरह पर चर्चा और हम दोनों सहेलियाँ जॉब रिलेटेड और बच्चों की बातों में मगन। नवेली छटंकी को अपने साथ खेलने के लिये ले गई। बीच में स्नैक्स और ड्रिंक्स सर्व हुए। Cracker and creamy spiced butter, बेक्ड स्पिनच बॉल, फ्राइड काजू और chicken टिक्का और पनीर टिक्का। Caramelized almonds के साथ Grey Goose Vodka और कुछ कोला लिम्का हम लेडीज़ के लिये। बच्चों लायक स्नैक्स वहाँ भिजवाने के लिये कहा तो अर्चना ने मना कर दिया। बोलीं कि बेबी फिर खाना नहीं खा पायेगी। मैंने इण्टरकॉम किया किचेन में और कहा कि बच्चों के लिये जो सामान बने हैं, उन्हें रेडी करके यहीँ ले आयें। उनका खाना पहले सर्व होगा। 

खाना आया और दोनों बच्चियों को भी बुलाया गया। नवेली बड़ों के साथ खाना चाहती थी लेकिन कल सुबह उसका स्कूल था, इसलिये मान गई प्रशस्ति के साथ खाने के लिये। मैंने आर्यन की छोटी वाली चेयर मँगवाई जिसपे छटंकी आराम से खाना खा सके। पहले चिकेन बर्गर और फिंगर चिप्स लाये गये। नवेली के बहुत पसन्दीदा थे, इसलिये वह तो तपाक से शुरू हो गई, लेकिन.. प्रशस्ति ने पहले मंत्र पढ़ना शुरू किया। इस बार मैंने ध्यान से सुना-----

 " ॐ सह नाववतु। 

सह नौ भुनक्तु। 

सह वीर्यं करवावहै। 

तेजस्विनावधीमस्तु। 

मा विदविषावहै।। 

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।। "

सभी लोग दंग रह गये उसे इतनी शुद्धता से संस्कृत पढ़ते हुए! जैसे अपने कानों पर विश्वास न हो रहा हो! इससे पहले कि वो खाना शुरू करती, अर्चना ने पूछा कि इसमें नॉन वेज तो नहीं? मैंने कहा कि chicken patty है, तो वो बोलीं, "सॉरी, मैं बताना भूल गई, इसे मीट से एलर्जी है, मुँह में जाते ही उल्टी हो जाती है। "

अरे, सब लोग आश्चर्य चकित रह गये। फिर क्या खायेगी ये, कुछ बच्चों की स्पेशल डिश तो वेज में बनवाई नहीं है। मम्मा बोलीं, "तुम भी तो वेजीटेरियन हो बेटी, जो सब्ज़ी तुम्हारे लिये है, उसी में से खा लेगी चपाती या चावल के साथ।" मैंने तुरन्त किचेन में ख़ुद जा कर देखा और उसकी प्लेट में मसूर की दाल का क़बाब, आलू मेथी की सूखी सब्ज़ी, दाल माखनी और पालक का पुलाव डलवाया। नान और मलाई कोफ़्ता भी था, लेकिन मुझे लगा कि उसके लिये हैवी हो जायेगा। ये खाना उसके सामने टेबल पर रख कर जब मैंने अर्चना से पूछा कि कोफ्ता और नान खा पायेगी क्या, तो वो बोलीं , " no no, she is a small eater." 

"Okee dokey, can I start now ?" हम सबने लगभग एक साथ ही हँस कर उसे go ahead कहा। उसे खाना अच्छा लग रहा था और वह बहुत चाव से खा रही थी। पालक पुलाव उसे बहुत पसन्द आया, उसने पूछा, "Mausi, can I have some more?" 

"Oh sure my doll " मैंने पालक पुलाव उसकी प्लेट में डाल दिया। मीठे में browny और गाजर का हलवा थे लेकिन उसका पेट भर चुका था, उसने कुछ और लेने से इन्कार कर दिया। हाथ धोने के लिये उठने लगी तो पूछने लगी कि खाना किसने बनाया है। जब मैंने बताया कि कुक केशव ने बिरजू काका के साथ मिल कर बनाया है तो उसने एक नोटपैड और पेन्सिल माँगा और फिर उसपर कुछ लिखने लगी। उसने कहा कि ये नोट वह उन दोनों को देना चाहती है। हमने दोनों लोगों को बुलवाया और उसने खड़े होकर बहुत विनम्रता से उन दोनों को एक एक नोट दिया और नमस्ते की मुद्रा बनाते हुए धन्यवाद कहा।  नोट में लिखा था कि " अंकल, इतना रुचिकर भोजन बनाने के लिये धन्यवाद!' और उसमे एक क्यूट बिल्ली की आँख बंद और दाँत निपोरे ड्रॉइंग थी। वो दोनों तो गदगद हो ही गये थे, हम लोग भी उसके इस शिष्टाचार से अचंभित थे। अभी तीन साल की भी नहीं है जो बच्ची, उससे इस व्यवहार की तवक्को भला कौन कर सकता है! ऐसी courtesy तो बहुत सारे बड़ों को भी नहीं आती कि अपने होस्ट की तारीफ़ कर दें। नवेली ने अपनी browny जो उसने आइसक्रीम के साथ ली थी, अब ख़त्म कर ली थी और वह प्रशस्ति को लेकर अपने रूम में कार्टून पिक्चर देखने चली गई। 

हम लोगों का खाना अब लग चुका था और अमित ने सबको डाइनिंग रूम में चलने का आमंत्रण दिया। स्टफ्ड पॉम्फ्रेट टेबल के बीच में और उसके हर तरफ़ एक से बढ़ कर एक डेलिकेसी, बिरजू काका ने दावत को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हैदराबादी बिरयानी और मिर्ची का सालन, रायता, चिकेन पसन्दा, मलाई कोफ़्ता, मसूर की दाल के क़बाब, आलू मेथी की सूखी सब्ज़ी, नान, पालक पुलाव और फ्रेश गार्डन सलाद। आशीष जी मछली देख के ख़ुश हो गये थे! सबने ख़ूब मज़े लेकर धीरे धीरे बातचीत करते हुए खाना खाया, मीठा ख़तम किया और वापस ड्रॉइंग रूम में आकर बैठ गये। ये हमारी इस शहर में शायद आख़िरी मुलाक़ात हो, ये सोच कर और भी धीरे धीरे हमारा खाना ख़तम हुआ था। सबको आधा आधा कप कॉफ़ी की तलब थी, या उसी बहाने कुछ और वक़्त साथ गुज़ारा जा सकता था। प्रशस्ति नवेली के साथ ही उसी के रूम में सो चुकी थी, इसलिये उसके सोने की भी चिन्ता नहीं थी। मम्मा डैडी तो अक्सर देर रात की पार्टी में जागते रहते थे तो उन लोगों को भी कोई दिक्क़त नहीं थी। 

अर्चना ने मुझसे कहा कि जब भी टाइम मिले, मैं छटंकी और मम्मा को देख आया करूँ, इससे उन्हें इत्मिनान रहेगा। वो न कहतीं तो भी मैं यही करती। इस नन्हीं परी में तो मेरी जान बसती है! कॉफ़ी का सिप लेते लेते हम लोग थोड़ी देर और यूँ ही बात करते रहे। फिर आख़िर चलने का समय आ गया। आँखों में आँसू छुपाते हुए हम दोनों सहेलियों ने एक दूसरे से विदा ली। आशीष जी प्रशस्ति को खुद नवेली के रूम से गोद में उठा कर लाये और गुड नाईट कहते हुए कार की पिछली सीट पर बैठ गये। ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी और पलकों में वो लोग हमारी आँखों से ओझल हो गये।


 

Tuesday, June 8, 2021

(अध्याय 5 )
 

                             पानी टूटता नहीं !



आर्यन से रोज़ फ़ोन पर बात हो जाती,वीकेंड में याहू मैसेंजर पर वीडियो कॉल भी,शुरू में कभी कभी लगता कि हुड़क रहा है हमारे लिये ,लेकिन तुरन्त ही अपने नये खिलौनों और दोस्तों की बातें करके अपना ध्यान वँहा से हटा लेता। उसकी इस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया,अपने नये माहौल में कितनी ख़ूबी से ढल गया था वो,अच्छा था कि सहर्ष ही वह रम गया वँहा, वरना अगर रोता पीटता तो भी कौन सा उसे वापस ले आया जाता!
इधर नर्सिंग होम में कुछ क्रिटिकल मरीज़ आये थे,उनकी तरफ़ से बहुत टेंशन रहा लेकिन सब ख़ैरियत से डिस्चार्ज हो गये तो एक दिन मैं अर्चना के घर चली गई। अर्चना टूर पर गई थीं,घर में कोई नहीं था। चपरासी ने अन्दर बैठाते हुए कहा कि "माताजी अभी आती होंगी बेबी को लेके,संगम तक गई हैं गंगा आरती के लिये।"  मैं बैठ कर इंतज़ार करने लगी। तभी थोड़ी देर में आशीष जी आ गये,मुझे आया देख कर तुरन्त ड्रॉइंग रूम में आये। अभिवादन के बाद हम लोगों ने एक दूसरे का हाल पूछा और तभी उन्होंने अपने हाथ का लिफ़ाफ़ा हिलाते हुए बताया कि उनका ट्रांसफर लखनऊ हो गया है सेक्रेटेरियट में। मेरे मुँह से निकला "aww ,तब क्या अर्चना भी वँहा का ट्रांसफर लेंगी" ? उन्होंने कंधे हिलाते हुए कहा "होप सो,लेना तो चाहिये पर देखते हैं वो क्या डिसाइड करती है" . तब तक मम्मा लौट आई थीं, आते ही प्रशस्ति अपने पापा की गोदी में चढ़ गई,उनका राइट हैंड खोल कर उसमें प्रसाद दिया,फिर बोली,"पापा, प्लीज़ नीचे उतारिये,मौसी को भी देना है." मैं इधर उधर देखने लगी कि अर्चना की सिस्टर कहीं हैं क्या,तब तक प्रशस्ति मेरे सामने खड़ी होकर बोली "नमस्ते मौसी!" फिर अपनी नानी से प्रसाद लेके उसने मेरे दाहिने हाथ को खोल कर दे दिया और मेरी गोद में चढ़ कर बैठ गई। मैं हैरान ही थी कि वो बोली,"जै कीजिये और ग्रहण करिये,लेटे वाले  हनुमान जी का है। " मैंने तुरन्त प्रसाद माथे से लगा के मुँह में डाला लेकिन अभी भी असमंजस में थी कि साढ़े तीन साल की बच्ची कैसे इतना शुद्ध उच्चारण कर सकती है! और ये कि इसने मुझे मौसी कैसे कहा,अर्चना तो उस दिन इसको बता रही थीं कि आंटी को नमस्ते करो। मम्मा समझ गईं थीं शायद मेरे मनोभाव को,इसलिये बताने लगीं कि प्रशस्ति एक अनोखी बच्ची है,कई बातें वो अपने से सीख कर सबको अचम्भित कर देती है। "तुम इसकी माँ की सहेली हो न बेटी,इसीलिये तुम्हें मौसी कह रही है। प्रशस्ति,सुन बिटिया,मौसी को कौन सा श्लोक सुनाएगी?"  प्रशस्ति तुरन्त अपने दोनों पैरों को क्रिस क्रॉस करके सोफ़े पर बैठ गई और सुनाने लगी," विद्या ददाति विनयं विनयात याति पात्रताम। पात्रतत्वात धनमाप्नोति धनात धर्मं ततः सुखम। "  मैं तो अवाक रह गई थी। "मौसी इसका अर्थ है कि ज्ञान विनमत्ता (विनम्रता ) प्रदान करता है,विनंमात्ता से योग्यता आती है और योग्यता से धन जिससे व्यत्ति धर्म के कार्य करता है और फिर सुखी रहता है। "  "अरे वाह प्रशस्ति तुम तो जीनियस हो भई ,ये तो तुम्हारी मौसी को नहीं आता था। " मैंने उससे कहा और जो सच था। ये श्लोक मैंने सुना भी नहीं था,छोटी सी बच्ची एकदम शुद्ध उच्चारण के साथ और अर्थ के साथ सुना रही थी,विनम्रता कहने में कुछ तोतलापन झलका लेकिन इतने छोटे बच्चे के लिये वो शब्द कठिन तो था ही। उसने तुरन्त कहा "धन्यवाद" जिसे सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई। मम्मा ने कहा कि "बिटिया बहुत अच्छा नाच गाना भी जानती है,प्रशस्ति मौसी को गाना सुनायेगी क्या अभी?"  तो  वो तुरन्त शुरू हो गई। ... "पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा बेटा हमारा ऐसा काम करेगा मगर ये तो कोई न जाने कि मेरी मम्मी है कँहा ....." मेरी हँसी को मैं नहीं रोक पाई,वो ठहाके की शक्ल में निकल पड़ी!प्रशस्ति शर्मा गई,मैंने ताली बजाते हुए कहा "कि तुम इतना अच्छा कैसे गा सकती हो,मुझे भी सिखाओ। "  तब वो सहज हुई।' मंज़िल' इतने छोटे बच्चे की समझ में नहीं आया होगा तो उसे मम्मी लगा होगा और इस सिचुएशन में जब उसकी मम्मी उसे मालूम नहीं कँहा थीं,ये गाना कितना अप्प्रोप्रिएट हो गया था! सुर,लय और ताल सब परफेक्ट बहुत टैलेंटेड बच्ची है। "नानी माँ, भोजन करना है। मौसी आप मेरे साथ खाइयेगा ना?"  बहुत प्यार से पूछा था उसने लेकिन घर पे सभी लोग वेट कर रहे होंगे इसलिये उससे अगली बार का वादा करते हुए बताया कि नवेली दीदी भी वेट कर रही होंगी इसलिये अभी चलती हूँ। "ओके देन नेक्स्ट टाइम" उसने बोला। मैं फिर चकित होकर उसे देखती रह गई,कितनी सहजता से अंग्रेज़ी भी बोल रही है ये! मम्मा बताने लगीं कि "आशीष-अर्चना और दोनों बिटिया अंग्रेज़ी का प्रयोग बहुत करते हैं न, हिन्दी तो घर में हम या ये चपरासी लोग ही बोलते हैं, तो बेबी दोनों भाषायें बहुत सहजता से बोल लेती है और ऊपर से संस्कृत भी सही उच्चारण से सीख रही है। कोई भी बात इसे दोबारा याद नहीं दिलानी पड़ती,इसकी स्मरण शक्ति बहुत तेज़ है!" ये कहते सुनते हुए हम लोग उठे और मैंने उन्हें नमस्कार किया और विदा ली। मम्मा प्रशस्ति का खाना लगाने किचेन की ओर बढ़ गईं। 
घर आकर भी मैं प्रशस्ति के बारे में ही सोच रही थी। कितनी प्यारी सी गुड़िया और कितनी प्यारी बातें! तभी अमित ने पूछा कि खाना क्यों नहीं ठीक से खा रही हूँ मैं, तब जा के ध्यान भंग हुआ। मैंने कहा "लेती हूँ अभी, पता है आशीष जी का ट्रांसफर लखनऊ हो गया है। उन्हीं के घर से आ रही हूँ। " "ओह  मम्मा, how is the little one, मुझे भी मिलना है उससे" . मैंने बताया "शी इज़ गुड। " अमित ने कहा कि "फिर तो तुम्हारा मन लगना मुश्किल हो जायेगा,क्लोज़ फ्रेंड चली जायेगी न। " नवेली बोली "and prashasti too dad !" अब क्या कर सकते हैं,सरकारी नौकरी में ये तो रूटीन चीज़ है। अमित ने बेटी को समझाया।
             मैं अपने रोज़मर्रा के कामों में busy चल रही थी।  आर्यन के साथ हर हफ़्ते बात होती थी और मैं उसे एक कहानी सुनाती थी। मन में गहरे बैठ गया था कि कुछ संस्कार, कुछ अपनी साँस्कृतिक विरासत उस तक ज़रूर पँहुचे। तो कभी पंचतंत्र के किस्से,तो कभी रामायण महाभारत के प्रसंग , हम लोग बहुत चाव से yahoo chat का इंतज़ार करते। आर्यन को मज़ा आता था ये कहानियाँ सुनने में। वह School जाकर अपने दोस्तों से भी शेयर करता था। एक दिन उसने बताया कि उसके फ्रेंड्स और टीचर्स बहुत impressed हैं ऐसी कहानियों से। मुझे ख़ुशी हुई कि दूर से ही सही, भारतीय संस्कारों की नींव तो मैं डाल पा रही हूँ अपने बच्चे में। 
           एक हफ़्ते बाद अर्चना का फ़ोन आया। उन्होंने कहा कि उनका ट्रांसफर हो गया है और पाँच दिन बाद उन्हें ज्वाइन करना है, तो क्या हम लोग कल मिल सकते हैं? मुझे पता था कि आशीष जी के साथ वो भी चली जायेंगी , इसलिये ताज्जुब नहीं हुआ. मैंने बोला कि Farewell डिनर पर आप सब आज ही आइये घर, लेकिन उन्होंने कहा कि वो सब फिर कभी,अभी तो हम दोनों मिल कर कुछ घँटे साथ में गप्पें मार लें,फिर ये लम्हे मिलें न मिलें! मैंने कहा done है. कल शनिवार है और आठ बजे रात को मिलना तय हुआ,इत्मिनान से देर तक बैठा जा सकता था। 
                   अगले दिन नर्सिंग होम से सीधे मैं अर्चना के घर निकल पड़ी। अमित High court के किसी function में गये थे और नवेली भी अपनी सहेली के यहाँ गई थी sleepover के लिये।डैडी और मम्मा पिक्चर देखने जाने वाले थे,बहुत दिनों बाद मम्मा की पसंद की कोई पुरानी क्लासिक मूवी Palace Theatre में लगी थी। 
                       घर पँहुचते ही प्रशस्ति ने नमस्ते करके मेरा दुपट्टा पकड़ लिया। "मौसी, आप कहाँ थीं? क्या आप गोदी लेंगी?" मैंने जैसे ही उसे गोद में उठाया, वो खिलखिला के हँस पड़ी। मुझे अन्दर ले जाते हुए बोली,"मौसी, आपको पता है भगवान जी कहाँ रहते हैं? हमको तो पता है!" मैंने चकित होते हुए कहा,"अच्छा, फिर बताओ तो कहाँ रहते हैं?" उसने बहुत आश्चर्य से मुझे देखा और पूछा, "सच्ची, आपको पता नहीं?" 
   तब तक हम लोग अर्चना के कमरे तक पँहुच चुके थे, मैंने उसको गोद से उतार के बेड पर बैठा दिया। अर्चना ने गर्मजोशी से गले लगा लिया। कुछ देर हम दोनों एक दूसरे को बाँहों में भींच के ऐसे ही खड़े रहे। "तो वो तो हमारे अन्दर रहते हैं ना ! मो को कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में!" प्रशस्ति की बात से हम दोनों की तंद्रा भंग हुई। इस बच्ची ने मुझे ज़रूरत से ज़्यादा हैरान किया है। जो बातें बड़ों को भी आसानी से समझ नहीं आतीं, उनको कैसे ये छटंकी सहजता से आत्मसात कर लेती है!अर्चना बोलीं, "लो जी, ये फिर शुरू हो गई। बहुत Talkative है, अब हम लोगों को बात थोड़े ही करने देगी!" मुझे मज़ा आ रहा था इतनी नन्ही बच्पानी ची से ऐसी बातें सुन के, इसलिये मैंने कहा," नहीं नहीं,इसकी बात बड़ी मज़ेदार होती है। हाँ बेटा, तो हम सबके अन्दर भगवान रहते हैं तब तो  बहुत सारे भगवान्  हुए, हम किस वाले को पुकारें?" 
"ओफ्फ होफ, वो तो एक ही हैं, टूटे थोड़े ही हैं! जग से गिलास में जाके पानी टूटता नहीं है ना, वैसे ही परमात्मा जो है वो हमारे अन्दर आत्मा बन के टूटता नहीं है, वो उसी पानी जैसा रहता है जो जग में है। आप किसी को पुकारिये, उन्हीं भगवान् जी को ही सुनाई देगा। " बच्ची ने तुरन्त समझाया। अवाक् रह कर मैं उसका मुँह देखती रह गई। अर्चना से कहा कि ये बच्ची तो चमत्कारी है, किसने इसे ये सब सिखाया? उन्होंने बताया कि "ये मम्मी के साथ भजन,पूजा,सत्संग,गँगा आरती वग़ैरह में जाती रहती है, वहीं कहीं से सीखा होगा, हम लोगों को तो पता भी नहीं है कि इतनी इनफार्मेशन इसका ब्रेन प्रोसेस कैसे करता है और कैसे ये अपने शब्दों में बताती है।" हम लोग तो Science के स्टूडेंट्स रहे, ये सब न तो पढ़ा सीखा,न ही इन रहस्यों की तह तक पँहुचने की कोशिश की,फिर भी इस नन्ही बच्ची का ज्ञान से ऐसे लबालब होना साधारण नहीं बल्कि दिव्य है।  
मम्मा आईं अपनी शाम की पूजा करके, उनसे दुआ सलाम हुई फिर वो प्रशस्ति को अपने साथ ले गईं ये सोच के कि हम लोग आराम से बातचीत कर सकें। अर्चना कहने लगीं कि उन्हें डिबरूगढ़ जाना है, एक बहुत ambitious रेलवे प्रोजेक्ट पर काम मिला है। मैंने तो सोचा था कि वो भी कमिश्नर साहब के साथ लखनऊ जायेंगी। लेकिन उन्होंने कहा कि असम का ये प्रोजेक्ट बहुत इम्पोर्टेन्ट है और इसे हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता। फिर उन्होंने ये भी बताया कि प्रशस्ति यहीँ रहेगी मम्मी के साथ, क्योंकि मम्मी को असम की आबो हवा सूट नहीं करती है। बाक़ी दोनों बेटियाँ तो देहरादून में पढ़ ही रही हैं, छोटी मम्मी के साथ आराम से यहीँ रहेगी। अब मैंने कुछ नहीं कहा कि इतनी नन्हीं बच्ची को माँ बाप के होते हुए भी अकेले अपनी नानी के साथ छोड़ना बहुत नाइंसाफ़ी है उसके साथ। एक ख़ुशी भी ज़रूर हुई कि चलो, बच्ची के साथ का सुख अभी मेरे हिस्से में रहेगा। ये मन भी अजब शाहकार है ---एक साथ अनेकों भाव सँजोये रखता है.. कुछ सुख के, कुछ दुःख के!
बातें चलती रहीं, डिनर टेबल पर सब लोग फिर इकठ्ठा हुए। सभी लड़कियाँ थीं तो अर्चना ने चाट नाईट का आयोजन कर लिया था। गोलगप्पे, टिकिया, समोसा, दहीवड़ा और छोले भठूरे।मज़ा आ गया देख कर! ख़ानसामा एक्सपर्ट था सारी डिशेज़ बनाने में। प्रशस्ति ने आधा भटूरा और थोड़े से छोले लिये। मैंने पूछा कि उसे चाट पसन्द है क्या तो उसने कहा,"थोडा थोडा । " मैंने ग़ौर किया कि छटंकी ड़ को ड बोलती है! वैसे तो हर शब्द का perfect उच्चारण, लेकिन अभी उम्र ही कितनी है, कुछ शब्द हैं जो बाल सुलभ भाव से बोल देती है। हम लोगों ने प्लेट में चीज़ें डालीं और खाना शुरू कर दिया पर प्रशस्ति हाथ जोड़ कर और आँखें बंद करके कोई मंत्र पढ़ रही थी नानी की तरह। मुझे तो मंत्र एकदम समझ नहीं आया सिवा लास्ट में जो उसने बोला ॐ शाँति शाँति शान्तिः ! उसने अपनी प्लेट के छोले भठूरे ख़त्म किये तो अर्चना ने पूछा और क्या चाहिये, तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा "गोल गोल मुँह में गप्प"  ! हम लोग हँस पड़े, उसे गोलगप्पा चाहिये था बिना पानी का। 
              खाने के बाद कॉफ़ी पीने का दौर चला, देर रात हो रही थी इसलिये प्रशस्ति को नींद आने लगी थी लेकिन वो अपनी आँखें मल मल के जगने की कोशिश कर रही थी। मैंने कहा कि इसको अब सोना चाहिये तो मम्मा ने बताया  कि वैसे तो इसका सोने का समय नौ बजे है, लेकिन मुझे छोड़ कर ये सोने जाने वाली नहीं। मेरे साथ इतना स्नेह का सम्बन्ध कैसे बाँध लिया इसने, ये सोच मुझे गुदगुदा गई। मैंने उसे अपने पास बुला कर गोद में बिठाया और समझाया कि वह सो जाये नहीं तो तबीयत ख़राब हो जायेगी। तब वो एकदम मान गई और बोली, "आज बस Twinkle twinkle little star होगा, ललिता सेहसनाम (सहत्रनाम ) नहीं। ..बहुत नींद आ रही है। " और वो ट्विंकल ट्विंकल सुनाते सुनाते मेरी गोद में सो गई। मम्मा बताने लगीं कि वह रोज़ ललिता सहत्रनाम श्रोत पढ़ के सोती है और विष्णु सहत्रनाम श्रोत पढ़ते हुए उठती है! रात में ललिता सहत्रनाम श्रोत पढ़ने से अद्भुत नींद आती है और विष्णु सहत्रनाम पढ़ के उठने से आदमी एकदम तारो ताज़ा रहता है। मेरे आश्चर्य की हर सीमा इस नन्ही परी ने तोड़ दी थी और तोड़ती ही जा रही थी। इतना उम्र दराज़ हो के भी मुझे इन मंत्रों और उनकी विशेषताओं के बारे में ज़रा नहीं पता था। मम्मा ने शायद मेरा भाव पढ़ लिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब उनके पास समय ही समय है बच्ची को ये सब सिखाने का, अपने बच्चों के समय तो घर और कॉलेज के इतने दायित्व होते थे कि फ़ुर्सत ही नहीं मिलती थी। फिर इस बच्ची की बुद्धि भी बहुत तेज़ है, जैसे कोई कम्प्यूटर, सेकेंड नहीं लगाती किसी चीज़ को याद करने में। प्रशस्ति मेरी गोद में सो चुकी थी, अर्चना ने उसे ले जा के उसके रूम में सुलाया. रात काफ़ी हो चली थी, मैं भी अब घर जाने के लिये उठ गई। ये था एक बहुत सुहाना समय, बेहद पुरसुक़ून और बेहद अविस्मरणीय, जो मेरी आत्मा में अंकित हो चला है। 

घर पहुँच कर मैंने देखा कि लौटने वालों  में  पहला नम्बर मेरा था। मैंने चेंज करके सोने की कोशिश तो की लेकिन आँखों से नींद ग़ायब। वहाँ तो छटंकी की बातें और उसी की तस्वीर घूम रही थी। सोचा आर्यन से yahoo पर ही chat कर लूँ, वहाँ Saturday Morning होगी, laptop खोला लेकिन वो मिला नहीं, फ्रेंड की Birthday Party में गया था। आस्था से थोड़ी देर बात हुई, तब तक अमित और मम्मा डैडी आ गये। सभी लोग काफ़ी थक चुके थे, इसलिये सोने जाने लगे, अब मुझे भी नींद आ रही थी और यहीँ पर प्रशस्ति को याद करते करते मेरी भी आँखें लग गईं। 

                                                                                                                                          क्रमशः 
                                                                                                                                   आरती श्रीवास्तव

(अध्याय 10 )                                    बरसात की वो रात  शाम को कुछ बूंदा-बांदी होने लगी। रात तक घनघोर बारिश के आसार थे। ऐसी जाड़े की...