Tuesday, June 8, 2021

(अध्याय 5 )
 

                             पानी टूटता नहीं !



आर्यन से रोज़ फ़ोन पर बात हो जाती,वीकेंड में याहू मैसेंजर पर वीडियो कॉल भी,शुरू में कभी कभी लगता कि हुड़क रहा है हमारे लिये ,लेकिन तुरन्त ही अपने नये खिलौनों और दोस्तों की बातें करके अपना ध्यान वँहा से हटा लेता। उसकी इस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया,अपने नये माहौल में कितनी ख़ूबी से ढल गया था वो,अच्छा था कि सहर्ष ही वह रम गया वँहा, वरना अगर रोता पीटता तो भी कौन सा उसे वापस ले आया जाता!
इधर नर्सिंग होम में कुछ क्रिटिकल मरीज़ आये थे,उनकी तरफ़ से बहुत टेंशन रहा लेकिन सब ख़ैरियत से डिस्चार्ज हो गये तो एक दिन मैं अर्चना के घर चली गई। अर्चना टूर पर गई थीं,घर में कोई नहीं था। चपरासी ने अन्दर बैठाते हुए कहा कि "माताजी अभी आती होंगी बेबी को लेके,संगम तक गई हैं गंगा आरती के लिये।"  मैं बैठ कर इंतज़ार करने लगी। तभी थोड़ी देर में आशीष जी आ गये,मुझे आया देख कर तुरन्त ड्रॉइंग रूम में आये। अभिवादन के बाद हम लोगों ने एक दूसरे का हाल पूछा और तभी उन्होंने अपने हाथ का लिफ़ाफ़ा हिलाते हुए बताया कि उनका ट्रांसफर लखनऊ हो गया है सेक्रेटेरियट में। मेरे मुँह से निकला "aww ,तब क्या अर्चना भी वँहा का ट्रांसफर लेंगी" ? उन्होंने कंधे हिलाते हुए कहा "होप सो,लेना तो चाहिये पर देखते हैं वो क्या डिसाइड करती है" . तब तक मम्मा लौट आई थीं, आते ही प्रशस्ति अपने पापा की गोदी में चढ़ गई,उनका राइट हैंड खोल कर उसमें प्रसाद दिया,फिर बोली,"पापा, प्लीज़ नीचे उतारिये,मौसी को भी देना है." मैं इधर उधर देखने लगी कि अर्चना की सिस्टर कहीं हैं क्या,तब तक प्रशस्ति मेरे सामने खड़ी होकर बोली "नमस्ते मौसी!" फिर अपनी नानी से प्रसाद लेके उसने मेरे दाहिने हाथ को खोल कर दे दिया और मेरी गोद में चढ़ कर बैठ गई। मैं हैरान ही थी कि वो बोली,"जै कीजिये और ग्रहण करिये,लेटे वाले  हनुमान जी का है। " मैंने तुरन्त प्रसाद माथे से लगा के मुँह में डाला लेकिन अभी भी असमंजस में थी कि साढ़े तीन साल की बच्ची कैसे इतना शुद्ध उच्चारण कर सकती है! और ये कि इसने मुझे मौसी कैसे कहा,अर्चना तो उस दिन इसको बता रही थीं कि आंटी को नमस्ते करो। मम्मा समझ गईं थीं शायद मेरे मनोभाव को,इसलिये बताने लगीं कि प्रशस्ति एक अनोखी बच्ची है,कई बातें वो अपने से सीख कर सबको अचम्भित कर देती है। "तुम इसकी माँ की सहेली हो न बेटी,इसीलिये तुम्हें मौसी कह रही है। प्रशस्ति,सुन बिटिया,मौसी को कौन सा श्लोक सुनाएगी?"  प्रशस्ति तुरन्त अपने दोनों पैरों को क्रिस क्रॉस करके सोफ़े पर बैठ गई और सुनाने लगी," विद्या ददाति विनयं विनयात याति पात्रताम। पात्रतत्वात धनमाप्नोति धनात धर्मं ततः सुखम। "  मैं तो अवाक रह गई थी। "मौसी इसका अर्थ है कि ज्ञान विनमत्ता (विनम्रता ) प्रदान करता है,विनंमात्ता से योग्यता आती है और योग्यता से धन जिससे व्यत्ति धर्म के कार्य करता है और फिर सुखी रहता है। "  "अरे वाह प्रशस्ति तुम तो जीनियस हो भई ,ये तो तुम्हारी मौसी को नहीं आता था। " मैंने उससे कहा और जो सच था। ये श्लोक मैंने सुना भी नहीं था,छोटी सी बच्ची एकदम शुद्ध उच्चारण के साथ और अर्थ के साथ सुना रही थी,विनम्रता कहने में कुछ तोतलापन झलका लेकिन इतने छोटे बच्चे के लिये वो शब्द कठिन तो था ही। उसने तुरन्त कहा "धन्यवाद" जिसे सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई। मम्मा ने कहा कि "बिटिया बहुत अच्छा नाच गाना भी जानती है,प्रशस्ति मौसी को गाना सुनायेगी क्या अभी?"  तो  वो तुरन्त शुरू हो गई। ... "पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा बेटा हमारा ऐसा काम करेगा मगर ये तो कोई न जाने कि मेरी मम्मी है कँहा ....." मेरी हँसी को मैं नहीं रोक पाई,वो ठहाके की शक्ल में निकल पड़ी!प्रशस्ति शर्मा गई,मैंने ताली बजाते हुए कहा "कि तुम इतना अच्छा कैसे गा सकती हो,मुझे भी सिखाओ। "  तब वो सहज हुई।' मंज़िल' इतने छोटे बच्चे की समझ में नहीं आया होगा तो उसे मम्मी लगा होगा और इस सिचुएशन में जब उसकी मम्मी उसे मालूम नहीं कँहा थीं,ये गाना कितना अप्प्रोप्रिएट हो गया था! सुर,लय और ताल सब परफेक्ट बहुत टैलेंटेड बच्ची है। "नानी माँ, भोजन करना है। मौसी आप मेरे साथ खाइयेगा ना?"  बहुत प्यार से पूछा था उसने लेकिन घर पे सभी लोग वेट कर रहे होंगे इसलिये उससे अगली बार का वादा करते हुए बताया कि नवेली दीदी भी वेट कर रही होंगी इसलिये अभी चलती हूँ। "ओके देन नेक्स्ट टाइम" उसने बोला। मैं फिर चकित होकर उसे देखती रह गई,कितनी सहजता से अंग्रेज़ी भी बोल रही है ये! मम्मा बताने लगीं कि "आशीष-अर्चना और दोनों बिटिया अंग्रेज़ी का प्रयोग बहुत करते हैं न, हिन्दी तो घर में हम या ये चपरासी लोग ही बोलते हैं, तो बेबी दोनों भाषायें बहुत सहजता से बोल लेती है और ऊपर से संस्कृत भी सही उच्चारण से सीख रही है। कोई भी बात इसे दोबारा याद नहीं दिलानी पड़ती,इसकी स्मरण शक्ति बहुत तेज़ है!" ये कहते सुनते हुए हम लोग उठे और मैंने उन्हें नमस्कार किया और विदा ली। मम्मा प्रशस्ति का खाना लगाने किचेन की ओर बढ़ गईं। 
घर आकर भी मैं प्रशस्ति के बारे में ही सोच रही थी। कितनी प्यारी सी गुड़िया और कितनी प्यारी बातें! तभी अमित ने पूछा कि खाना क्यों नहीं ठीक से खा रही हूँ मैं, तब जा के ध्यान भंग हुआ। मैंने कहा "लेती हूँ अभी, पता है आशीष जी का ट्रांसफर लखनऊ हो गया है। उन्हीं के घर से आ रही हूँ। " "ओह  मम्मा, how is the little one, मुझे भी मिलना है उससे" . मैंने बताया "शी इज़ गुड। " अमित ने कहा कि "फिर तो तुम्हारा मन लगना मुश्किल हो जायेगा,क्लोज़ फ्रेंड चली जायेगी न। " नवेली बोली "and prashasti too dad !" अब क्या कर सकते हैं,सरकारी नौकरी में ये तो रूटीन चीज़ है। अमित ने बेटी को समझाया।
             मैं अपने रोज़मर्रा के कामों में busy चल रही थी।  आर्यन के साथ हर हफ़्ते बात होती थी और मैं उसे एक कहानी सुनाती थी। मन में गहरे बैठ गया था कि कुछ संस्कार, कुछ अपनी साँस्कृतिक विरासत उस तक ज़रूर पँहुचे। तो कभी पंचतंत्र के किस्से,तो कभी रामायण महाभारत के प्रसंग , हम लोग बहुत चाव से yahoo chat का इंतज़ार करते। आर्यन को मज़ा आता था ये कहानियाँ सुनने में। वह School जाकर अपने दोस्तों से भी शेयर करता था। एक दिन उसने बताया कि उसके फ्रेंड्स और टीचर्स बहुत impressed हैं ऐसी कहानियों से। मुझे ख़ुशी हुई कि दूर से ही सही, भारतीय संस्कारों की नींव तो मैं डाल पा रही हूँ अपने बच्चे में। 
           एक हफ़्ते बाद अर्चना का फ़ोन आया। उन्होंने कहा कि उनका ट्रांसफर हो गया है और पाँच दिन बाद उन्हें ज्वाइन करना है, तो क्या हम लोग कल मिल सकते हैं? मुझे पता था कि आशीष जी के साथ वो भी चली जायेंगी , इसलिये ताज्जुब नहीं हुआ. मैंने बोला कि Farewell डिनर पर आप सब आज ही आइये घर, लेकिन उन्होंने कहा कि वो सब फिर कभी,अभी तो हम दोनों मिल कर कुछ घँटे साथ में गप्पें मार लें,फिर ये लम्हे मिलें न मिलें! मैंने कहा done है. कल शनिवार है और आठ बजे रात को मिलना तय हुआ,इत्मिनान से देर तक बैठा जा सकता था। 
                   अगले दिन नर्सिंग होम से सीधे मैं अर्चना के घर निकल पड़ी। अमित High court के किसी function में गये थे और नवेली भी अपनी सहेली के यहाँ गई थी sleepover के लिये।डैडी और मम्मा पिक्चर देखने जाने वाले थे,बहुत दिनों बाद मम्मा की पसंद की कोई पुरानी क्लासिक मूवी Palace Theatre में लगी थी। 
                       घर पँहुचते ही प्रशस्ति ने नमस्ते करके मेरा दुपट्टा पकड़ लिया। "मौसी, आप कहाँ थीं? क्या आप गोदी लेंगी?" मैंने जैसे ही उसे गोद में उठाया, वो खिलखिला के हँस पड़ी। मुझे अन्दर ले जाते हुए बोली,"मौसी, आपको पता है भगवान जी कहाँ रहते हैं? हमको तो पता है!" मैंने चकित होते हुए कहा,"अच्छा, फिर बताओ तो कहाँ रहते हैं?" उसने बहुत आश्चर्य से मुझे देखा और पूछा, "सच्ची, आपको पता नहीं?" 
   तब तक हम लोग अर्चना के कमरे तक पँहुच चुके थे, मैंने उसको गोद से उतार के बेड पर बैठा दिया। अर्चना ने गर्मजोशी से गले लगा लिया। कुछ देर हम दोनों एक दूसरे को बाँहों में भींच के ऐसे ही खड़े रहे। "तो वो तो हमारे अन्दर रहते हैं ना ! मो को कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में!" प्रशस्ति की बात से हम दोनों की तंद्रा भंग हुई। इस बच्ची ने मुझे ज़रूरत से ज़्यादा हैरान किया है। जो बातें बड़ों को भी आसानी से समझ नहीं आतीं, उनको कैसे ये छटंकी सहजता से आत्मसात कर लेती है!अर्चना बोलीं, "लो जी, ये फिर शुरू हो गई। बहुत Talkative है, अब हम लोगों को बात थोड़े ही करने देगी!" मुझे मज़ा आ रहा था इतनी नन्ही बच्पानी ची से ऐसी बातें सुन के, इसलिये मैंने कहा," नहीं नहीं,इसकी बात बड़ी मज़ेदार होती है। हाँ बेटा, तो हम सबके अन्दर भगवान रहते हैं तब तो  बहुत सारे भगवान्  हुए, हम किस वाले को पुकारें?" 
"ओफ्फ होफ, वो तो एक ही हैं, टूटे थोड़े ही हैं! जग से गिलास में जाके पानी टूटता नहीं है ना, वैसे ही परमात्मा जो है वो हमारे अन्दर आत्मा बन के टूटता नहीं है, वो उसी पानी जैसा रहता है जो जग में है। आप किसी को पुकारिये, उन्हीं भगवान् जी को ही सुनाई देगा। " बच्ची ने तुरन्त समझाया। अवाक् रह कर मैं उसका मुँह देखती रह गई। अर्चना से कहा कि ये बच्ची तो चमत्कारी है, किसने इसे ये सब सिखाया? उन्होंने बताया कि "ये मम्मी के साथ भजन,पूजा,सत्संग,गँगा आरती वग़ैरह में जाती रहती है, वहीं कहीं से सीखा होगा, हम लोगों को तो पता भी नहीं है कि इतनी इनफार्मेशन इसका ब्रेन प्रोसेस कैसे करता है और कैसे ये अपने शब्दों में बताती है।" हम लोग तो Science के स्टूडेंट्स रहे, ये सब न तो पढ़ा सीखा,न ही इन रहस्यों की तह तक पँहुचने की कोशिश की,फिर भी इस नन्ही बच्ची का ज्ञान से ऐसे लबालब होना साधारण नहीं बल्कि दिव्य है।  
मम्मा आईं अपनी शाम की पूजा करके, उनसे दुआ सलाम हुई फिर वो प्रशस्ति को अपने साथ ले गईं ये सोच के कि हम लोग आराम से बातचीत कर सकें। अर्चना कहने लगीं कि उन्हें डिबरूगढ़ जाना है, एक बहुत ambitious रेलवे प्रोजेक्ट पर काम मिला है। मैंने तो सोचा था कि वो भी कमिश्नर साहब के साथ लखनऊ जायेंगी। लेकिन उन्होंने कहा कि असम का ये प्रोजेक्ट बहुत इम्पोर्टेन्ट है और इसे हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता। फिर उन्होंने ये भी बताया कि प्रशस्ति यहीँ रहेगी मम्मी के साथ, क्योंकि मम्मी को असम की आबो हवा सूट नहीं करती है। बाक़ी दोनों बेटियाँ तो देहरादून में पढ़ ही रही हैं, छोटी मम्मी के साथ आराम से यहीँ रहेगी। अब मैंने कुछ नहीं कहा कि इतनी नन्हीं बच्ची को माँ बाप के होते हुए भी अकेले अपनी नानी के साथ छोड़ना बहुत नाइंसाफ़ी है उसके साथ। एक ख़ुशी भी ज़रूर हुई कि चलो, बच्ची के साथ का सुख अभी मेरे हिस्से में रहेगा। ये मन भी अजब शाहकार है ---एक साथ अनेकों भाव सँजोये रखता है.. कुछ सुख के, कुछ दुःख के!
बातें चलती रहीं, डिनर टेबल पर सब लोग फिर इकठ्ठा हुए। सभी लड़कियाँ थीं तो अर्चना ने चाट नाईट का आयोजन कर लिया था। गोलगप्पे, टिकिया, समोसा, दहीवड़ा और छोले भठूरे।मज़ा आ गया देख कर! ख़ानसामा एक्सपर्ट था सारी डिशेज़ बनाने में। प्रशस्ति ने आधा भटूरा और थोड़े से छोले लिये। मैंने पूछा कि उसे चाट पसन्द है क्या तो उसने कहा,"थोडा थोडा । " मैंने ग़ौर किया कि छटंकी ड़ को ड बोलती है! वैसे तो हर शब्द का perfect उच्चारण, लेकिन अभी उम्र ही कितनी है, कुछ शब्द हैं जो बाल सुलभ भाव से बोल देती है। हम लोगों ने प्लेट में चीज़ें डालीं और खाना शुरू कर दिया पर प्रशस्ति हाथ जोड़ कर और आँखें बंद करके कोई मंत्र पढ़ रही थी नानी की तरह। मुझे तो मंत्र एकदम समझ नहीं आया सिवा लास्ट में जो उसने बोला ॐ शाँति शाँति शान्तिः ! उसने अपनी प्लेट के छोले भठूरे ख़त्म किये तो अर्चना ने पूछा और क्या चाहिये, तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा "गोल गोल मुँह में गप्प"  ! हम लोग हँस पड़े, उसे गोलगप्पा चाहिये था बिना पानी का। 
              खाने के बाद कॉफ़ी पीने का दौर चला, देर रात हो रही थी इसलिये प्रशस्ति को नींद आने लगी थी लेकिन वो अपनी आँखें मल मल के जगने की कोशिश कर रही थी। मैंने कहा कि इसको अब सोना चाहिये तो मम्मा ने बताया  कि वैसे तो इसका सोने का समय नौ बजे है, लेकिन मुझे छोड़ कर ये सोने जाने वाली नहीं। मेरे साथ इतना स्नेह का सम्बन्ध कैसे बाँध लिया इसने, ये सोच मुझे गुदगुदा गई। मैंने उसे अपने पास बुला कर गोद में बिठाया और समझाया कि वह सो जाये नहीं तो तबीयत ख़राब हो जायेगी। तब वो एकदम मान गई और बोली, "आज बस Twinkle twinkle little star होगा, ललिता सेहसनाम (सहत्रनाम ) नहीं। ..बहुत नींद आ रही है। " और वो ट्विंकल ट्विंकल सुनाते सुनाते मेरी गोद में सो गई। मम्मा बताने लगीं कि वह रोज़ ललिता सहत्रनाम श्रोत पढ़ के सोती है और विष्णु सहत्रनाम श्रोत पढ़ते हुए उठती है! रात में ललिता सहत्रनाम श्रोत पढ़ने से अद्भुत नींद आती है और विष्णु सहत्रनाम पढ़ के उठने से आदमी एकदम तारो ताज़ा रहता है। मेरे आश्चर्य की हर सीमा इस नन्ही परी ने तोड़ दी थी और तोड़ती ही जा रही थी। इतना उम्र दराज़ हो के भी मुझे इन मंत्रों और उनकी विशेषताओं के बारे में ज़रा नहीं पता था। मम्मा ने शायद मेरा भाव पढ़ लिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब उनके पास समय ही समय है बच्ची को ये सब सिखाने का, अपने बच्चों के समय तो घर और कॉलेज के इतने दायित्व होते थे कि फ़ुर्सत ही नहीं मिलती थी। फिर इस बच्ची की बुद्धि भी बहुत तेज़ है, जैसे कोई कम्प्यूटर, सेकेंड नहीं लगाती किसी चीज़ को याद करने में। प्रशस्ति मेरी गोद में सो चुकी थी, अर्चना ने उसे ले जा के उसके रूम में सुलाया. रात काफ़ी हो चली थी, मैं भी अब घर जाने के लिये उठ गई। ये था एक बहुत सुहाना समय, बेहद पुरसुक़ून और बेहद अविस्मरणीय, जो मेरी आत्मा में अंकित हो चला है। 

घर पहुँच कर मैंने देखा कि लौटने वालों  में  पहला नम्बर मेरा था। मैंने चेंज करके सोने की कोशिश तो की लेकिन आँखों से नींद ग़ायब। वहाँ तो छटंकी की बातें और उसी की तस्वीर घूम रही थी। सोचा आर्यन से yahoo पर ही chat कर लूँ, वहाँ Saturday Morning होगी, laptop खोला लेकिन वो मिला नहीं, फ्रेंड की Birthday Party में गया था। आस्था से थोड़ी देर बात हुई, तब तक अमित और मम्मा डैडी आ गये। सभी लोग काफ़ी थक चुके थे, इसलिये सोने जाने लगे, अब मुझे भी नींद आ रही थी और यहीँ पर प्रशस्ति को याद करते करते मेरी भी आँखें लग गईं। 

                                                                                                                                          क्रमशः 
                                                                                                                                   आरती श्रीवास्तव

1 comment:

  1. Wonderful 👍👍 very gripping and interesting. Please be quick in sharing next chapter. Can't wait to read more .. awesome

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