Tuesday, September 24, 2019



 ये पँक्तियाँ मैंने  21. 9 . 2012  को लिखी थीं।

इक नूर है मेरे साथ में,
तेरा हाथ जबसे है हाथ में;
यूँ ही हाथ थामे चले चलो
जब तक चले ये ज़िन्दगी।

चाहे पास हो चाहे दूर हो,
बसे दिल में मेरे ज़रूर हो
कहीं जा बसों, कहीं भी रहो,
बसती यँहा बस्ती तेरी।
                                       ........ आरती

Wednesday, September 11, 2019

     (अध्याय 4) 

                                            पाठशाला 


तारीख़ें बदलती रहीं , दिन, महीने और साल निकलते रहे। समय अपनी रफ़्तार से ही चलता रहा पर हर पल लगा कि पँख लगा कर उड़ता जा रहा है। जीवन हाथों से फिसलता लगता था, मेरे बच्चों का मुझसे दूर होने का पल तेज़ी से पास आता जा रहा था। पहले आर्यन को जाना था अमेरिका और फिर नवेली को देहरादून। जब एक बार पढाई शुरू हो जाती है तो बच्चे घर से निकलने के बाद बस छुट्टी बिताने ही आ पाते हैं, अपने माँ बाप के साथ रहने नहीं। बेटी हो या बेटा, आजकल तो दोनों ही घर से विदा ही हो जाते हैं। वो दौर और थे जब बेटियाँ शादी होने के बाद ही आपसे दूर जाती थीं, आजकल तो वो भी बोर्डिंग में जाती है पढ़ने और तभी से आपसे बिछड़ सी जाती हैं।बेटे भी पढाई के चक्कर में घर से निकले तो जहाँ नौकरी ले जाये, जाना ही होता है, घर में रह जाते हैं बस पति-पत्नी, हम भी नौकरी के चक्कर में जो घर से निकले तो फिर अपने मां-पापा के लिए मेहमान ही हो गये थे। मेरे मम्मी पापा थोड़े भाग्यशाली थे इस मामले में कि हम भाई-बहन बोर्डिंग में नहीं पढ़े थे, इस वजह से हमारा साथ थोड़ा लम्बा रहा। 
दो साल यूँ ही पँख लगा के उड़ गये। आर्यन मार्च में पाँच साल का हो गया था। सितम्बर से उसका स्कूल year शुरू होना था new Jersey में, जून में एक महीने की जो छुट्टी होती है high court में, उसी में हम सब यूनाइटेड स्टेट्स जा रहे थे। अमित और डैडी  तो जुलाई में लौट आने वाले थे लेकिन मैं और मम्मा  6 महीने के लिये वहीं रहने वाले थे। मैंने बहुत हिम्मत करके  इतना लम्बा प्लान बनाया था, लेकिन अमित का ख़्याल था कि नवेली को मैं इतने लम्बे समय के लिये यहाँ नहीं छोड़ पाऊँगी। बात शायद सही ही थी, लेकिन आर्यन को भी तो मैं अकेला नहीं छोड़ पा रही थी। अमित और उनकी बहन आस्था में शर्त लग गई थी,आस्था का कहना था कि मैं आर्यन को अकेला नहीं छोड़ पाऊँगी क्योंकि वो छोटा है। मेरे लिये तो दोनों ही मेरे शरीर के अटूट हिस्से थे, काश मैं अपने दो टुकड़े कर पाती और दोनों के साथ आधा-आधा बँट जाती! 
हमारी विदेश यात्रा की तैयारी पूरी हो चुकी थी। मेरे नर्सिंग होम में भी मैंने अपनी जगह एक सीनियर डॉक्टर का arrangement कर दिया था और मैं उस फ्रंट पे निश्चिन्त हो गई थी। जयन्ती दी मेरी सीनियर थीं और अच्छी डॉक्टर थीं,मेडिकल कॉलेज में काम कर रही थीं और उन्होंने मेरा काम भी देखना सहर्ष स्वीकार कर लिया था। नवेली बहुत excited थी और आर्यन भी ख़ुश था, बेचारे को अभी ये अनुभव नहीं था कि mom -dad से अलग होकर कैसा लगेगा। 
हमारी फ्लाइट दिल्ली से थी, Air  India की direct flight जो बिना कहीं बीच में रुके करीब 15 घण्टे में Newark airport ले आई थी। छोटे बच्चों के साथ इतनी लम्बी journey की वजह से सभी को बहुत थकान हो गई थी। आस्था और निशीथ हमें लेने airport आये थे। शनिवार था, दोनों की छुट्टी थी, दोनों ही डॉक्टर थे और एक ही हॉस्पिटल में काम करते थे। आस्था internal medicine में थी और निशीथ सर्जन थे। एक बच्चा था प्रथम जो नवेली से  बड़ा था। हम सभी अपने पूरे साज़ो सामान के साथ एक गाड़ी में fit नहीं हो सकते थे, इसलिये निशीथ अपनी 8 seater suburban तो लाये ही थे, आस्था भी अपनी 8 seater Mercedes Gl 450 ले आई थी, आख़िर हम 6 लोग थे और सबके साथ 2 -2 बड़े बड़े सूटकेस भी थे। कुछ तो अपना सामान था लेकिन ज़्यादा gift items थे जो निशीथ के परिवार और उन दोनों के मित्रों के लिये हम ले के आये थे। कुछ मिठाई, अँचार , गाँव का असली देसी घी वगैरह था,कुल  मिला के काफ़ी सामान हो गया था। ख़ैर, दोनों गाड़ियाँ काफ़ी बड़ी थीं और हम सारे सामानों के साथ अच्छी तरह से अंट गये थे। अमित ने निशीथ से गाड़ी की चाबी छीन ली थी, उन्हें driving का बहुत शौख़ है और अमेरिका में तो रफ़्तार के साथ हवा से बातें करना उन्हें बहुत पसँद है। अपना इंटरनेशनल driving license  वो साथ लाये थे,बस हम लोग दो group में बँट गये। मम्मा और तीनों बच्चे आस्था के साथ और मैं, डैडी, अमित चल दिये निशीथ की कार में। निशीथ पूरे रास्ते हम दोनों को छेड़ते रहे, बहुत मज़ाकिया स्वभाव है उनका। मेरा इस धरती पर पहली बार आना हुआ था, अमित तो अक्सर आते रहते थे कभी alumni में, कभी दोस्तों के functions में,उनका बहुत बड़ा सर्किल है अमेरिका में। आस्था मुझसे उम्र में बड़ी है और अमित से छोटी, तो इस नाते से निशीथ का सरहज के साथ मज़ाक़ का रिश्ता बनता है। "यार,लाल झंडी है इस बार,ज़रा ध्यान से गाड़ी चलाना !" निशीथ मेरे लाल रंग के stole को निशाना बना के अमित से कह रहे थे। "तुम तो फ़िक्र ही न करो, मैंने कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं" अमित ने पलट के जवाब दिया। दोनों ने एक दूसरे को रहस्य्मय अंदाज़ से देखा और फिर ठहाका लगा के हँस पड़े। ये बात बाउंसर की तरह मेरे सर के ऊपर से निकल गई पर मैं धीरे से मुस्कुरा पड़ी। 
शहर बहुत सुन्दर दिख रहा था,मौसम भी गुलाबी ठण्ड वाला था जबकि इंडिया में तो भीषण गर्मी पड़ रही थी. चार या पाँच लेन्स में रफ़्तार से दौड़ती गाड़ियाँ जल्दी ही अपनी मंज़िल पर पहुँचा देती हैं। हम भी पौन घंटे में घर पहुँच गये। दोनों तरफ़ पेड़ों से सजा हुआ एक बड़ा सा driveway , jungle के बीच बना हुआ आलीशान मकान, जंगल भी उनका अपना है जिसमें जाड़े में जब पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं तो निशीथ शिकार करते हैं, हिरण उनके backyard में घूमते हैं और आस्था बताती है कि उसके मीट के क़बाब बहुत tasty होते हैं। हिरण का मीट delicacy माना जाता है। सभी लोग गराज से अँदर दाख़िल हुए, घुसते ही किचेन था। वँहा ढेर सारा खाना आस्था ने बना के रखा हुआ था,cooking उसे खुद ही करनी पड़ती थी, जो उसे बिलकुल पसन्द नहीं थी। "भाभी आप लोग फ्रेश हो जाइये,लम्बे सफ़र से आये हैं,then i am going to serve dinner ,all right ?" शाम के पाँच बजने वाले थे, अमेरिकन्स खाना शाम में ही खा लेते हैं, इसीलिये इन लोगों की भी वही आदत पड़ गई थी। साढ़े 6 बजे तक उनका dinner हो जाता था। डैडी को दिक्कत होती थी लेकिन बेटी दामाद के घर वो कुछ बोलते नहीं थे। दोनों बच्चों को नहला के पहले भेज दिया और उन्होंने chicken nuggets, fries का डिनर बहुत ख़ुश हो के किया। फ्रूट पंच था उनके ड्रिंक में,जिसे नवेली और आर्यन ने बहुत एन्जॉय किया। जब हम लोग तैयार हो के आये तो ड्रिंक्स सर्वे हुए, निशीथ ख़ुद सबकी पसन्द का ड्रिंक बड़ी ख़ुशी से बना रहे थे। मैं alcoholic drinks नहीं लेती तो मेरे लिये tropical mango wine cooler निकाल लाये और बहुत इन्सिस्ट करने लगे पीने के लिये, बोले "ले लीजिये कुछ नहीं होता, अगर आप उड़ने लगेंगीं तो हम तो हैं ही, थाम लेंगें ! अमित को भी तो पता चले कि पी कर बीवी क्या क्या हँगामा कर सकती है ! अपने सर पे तो ताँडव रोज़ ही होता है! हाहाहा  !" आस्था बोली "अरे भाभी,कोई नशा नहीं इसमें,alcohol content कफ़ सिरप से भी कम है,taste के लिये पीजिये " . मैंने हाथ में बोतल ले ली और बाद में उसे sink में dump कर दिया। नन्दोई थे,उनकी बात को एकदम टाल न सकी। खाना खाने का एकदम मन नहीं कर रहा था, नींद बहुत ज़ोर से आ रही थी jet lag था हम लोगों को, लेकिन बिना खाये आस्था और निशीथ कँहा  छोड़ने वाले थे! बिरयानी, shrimp curry, तंदूरी chicken, कटहल कोफ़्ता, सूखे मेथी-आलू, रायता---क्या कुछ नहीं बना रखा था उसने! सबकी पसंद की कोई न कोई dish, dessert में गुलाब जामुन और browny  with ice cream ... ऊपर से खिलाने वाले निशीथ जैसे host, लगा कि पेट ही फाड़ के रख देंगे। शायद मेरे भाव पढ़ चुके थे वो, बोले "अरे भाभीजी, बिल्कुल tension नहीं लीजिये, सुई धागा घर में ही रखा है,तुरन्त सिल दूँगा ! आख़िर सर्जरी किस दिन और किसके लिये काम आयेगी ! हाहाहा!!" 
                                                   "कौन कहेगा कि तुम्हारा कुकिंग में मन नहीं लगता आस्था, फ़ूड इज़ रियली टू गुड" मैंने आस्था से कहा। "बस भाभी मजबूरी जो न करा दे, वैसे अब सोच रहे हैं बटलर रख लें। गोरा मिलेगा, उसे अपनी रेसिपीज़ सिखानी पड़ेगी,बाक़ी तो वो बना ही लेगा। " मम्मा ने कहा कि तब तो बहुत अच्छा हो जायेगा क्योंकि आर्यन के रहने से उसका काम और बढ़ ही जायेगा। आर्यन को छोड़ने के ख़याल से मन फिर भारी हो गया, जल्दी जल्दी सब समेटा हम लोगों ने,लेडीज़ ने leftover box किये और gents डिशेज़ धोने में लग गये। यँहा का यही ट्रेडीशन है, डिशेज़ धोने का काम आदमी लोग करते हैं और लेडीज़ डिशेज़ ख़ाली करती हैं। मिल जुल के काम जल्दी निपट जाता है। 
बच्चे प्रथम के साथ सो रहे थे। हम लोग ऊपर के बेडरूम में और मम्मा -डैडी नीचे गेस्ट रूम में सोने चले गये। अभी उजाला था बाहर, गर्मी में सात बजे तक तो सूरज डूबता नहीं है। अब मेरी आँखों से नींद उड़ चुकी थी। जाने कैसे आर्यन एडजस्ट करेगा एकदम नये माहौल में, सोच-सोच के जान सूख रही थी। फिर ये भी ख़याल मन को परेशान कर रहा था कि अभी से हम लोगों से दूर रह कर क्या वह हमसे वो जुड़ाव महसूस करेगा जो प्राकृतिक रूप से एक बच्चा अपने मां -बाप से करता है या हमारा बस एक औपचारिक रिश्ता रह जायेगा? इन्हीं सब उधेड़-बुन में कब सवेरा हो गया पता ही नहीं चला। अमित की नींद खुल चुकी थी, मुझे जागते देख कर उन्होंने कहा कि "तुम बहुत सोचती हो,एक दिन सोच-सोच के पागल हो जाओगी। " 
                        Sunday की सुबह थी, सभी का मूड बहुत अच्छा था। बाहर deck पर बैठ कर फूल पौधों के बीच में चाय नाश्ता हुआ। फिर पीछे जंगल में हम  सब हाईकिंग के लिये निकल गये। निशीथ और अमित ने डिनर में barbecue का प्लान बना लिया। घर लौट कर आस्था को चिकेन और मछली thaw करने के लिए निकालनी थी ,फिर उसे marinate भी करना था। "भाभी डियर आपको तो सिर्फ़ corn on the cob मिलेगा, उसी से गुज़ारा करियेगा। हाहाहा !" "साले, मेरी wife को भूखा मारेगा क्या?" "व्हाट दा, साला तो  तू है बे!" दोनों जीजा साले कम, डायपर बडी ज़्यादा थे इसलिये बातचीत में बेतक़ल्लुफ़ी बरतते थे। आस्था ने अमित के फ्रेंड से अपनी पसन्द की शादी की थी। जँगल बहुत घना नहीं था, लेकिन उसमे से गुज़रती घुमावदार पगडंडी और बीच बीच में पतली धारा वाली नदी का बहाव, सब कुछ किसी किताब में छपी पेन्टिंग जैसा लग रहा था। हम लोग एक घन्टे तक घूमते रहे थे, हल्की बूंदा-बांदी होने लगी थी, तब भी मन कर रहा था वहीं किसी पेड़ के नीचे ठहर जायें लेकिन बच्चे अकेले थे और देर काफ़ी हो गई थी, इसलिये लौटना मुनासिब लगा।
डिनर शाम को ही हो गया, अगला दिन वर्किंग डे था, सब सोने के लिये जाने लगे तभी अमित ने announce किया कि कल वो रेन्टल कार लेके न्यू यॉर्क जायेंगे। मैंने निशीथ को आँखें तरेरते हुए देखा लेकिन उन्होंने तुरन्त नज़रें चुरा लीं ,अमित अपने प्रोग्राम पे क़ायल रहे। अगली सुबह नौ बजे enterprise की कार उन्हें पिक करने आ गई। अमित ने बताया कि दो-तीन दिन में वापस आ जायेँगे।
प्रथम की भी छुट्टियाँ चल रही थीं, सभी बच्चे आपस में खेलते रहते दिन भर, पडोसी बच्चे भी आ जाते और ट्रैम्पोलीन पर, कभी स्लाइड पर तो कभी साइकिलिंग करते उनका दिन बहुत मस्ती में कट जाता। हम सब ने बहुत एन्जॉय किया, कभी हम RV में पिकनिक पर जाते तो कभी बीच पर,हर वीकेंड कुछ न कुछ प्रोग्राम ज़रूर रहता। मैंने और मेरे बच्चों ने RV पहली बार ही देखी थी,देखना तो दूर, इसके बारे में सुना भी नहीं था  इतने सालों पहले, इतनी बड़ी गाड़ी, गाड़ी नहीं एक पूरा घर पहियों पर लेके घूमना,एक अनोखा ही अनुभव था। आर्यन का मन वहाँ लगता जा रहा था। अमित भी ज़रुरत से ज़्यादा ही खुश थे, इस एक महीने में उनके अकेले के तीन चक्कर लग चुके थे। दोस्तों से मिलने कभी बॉस्टन जाते तो कभी कहीं और। एक चीज़ मैंने नोटिस की कि जब भी वो जाते, निशीथ और आस्था बहुत टेन्स हो जाते थे। वक़्त गुज़रते देर नहीं लगती, वक़्त आ गया था डैडी और  अमित के वापस जाने का, हाई कोर्ट खुलने वाला था जुलाई में और नवेली का स्कूल भी। मेरी मम्मी घर पर आ कर नवेली को देख लेंगी,ये इंतज़ाम करके ही हम आये थे। मम्मी मेरी ससुराल आके रुकना नहीं चाहती थीं लेकिन नातिन के लिए ये भी करने को तैयार हो गई थीं। अगले दिन की flight थी। मैं अमित की पैकिंग देख रही थी तभी doorbell बजी। थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि यँहा पहले से सूचित किये बिना कोई आता नहीं है।ख़ैर मैं अपने काम में लगी रही। कुछ देर में लिविंग रूम की तरफ़ से किसी महिला के चीखने की आवाज़ आने लगी। मेरे रोंगटे खड़े हो गये , आख़िर कौन आ के घर में इतने uncivilized तरीक़े से बात कर रहा है? कुछ देर उलझन की सी स्थिति रही कि मुझे वँहा जाना चाहिये या नहीं, लेकिन फिर रहा नहीं गया और क़दम उस ओर बढ़ गये। "आई जस्ट डोंट केयर हाउ वुड यू मैनेज, नॉट गोइंग टु हिअर एनी बुलशिट, कम विद मी  राइट नाव। ." चीख़ अब साफ़ सुनाई दे रही थी। एक अधेड़ उम्र की लेडी दरवाज़े पे चीख़ रही थी और अमित सामने चुपचाप खड़े उसे देख रहे थे और निशीथ उसे calm down होने के लिये कह रहे थे। "ओके फाइन एमी, होल्ड ऑन " कहते हुए अमित पीछे मुड़े और मुझे वँहा देख पल भर को सकपका गये। लेकिन अगले ही पल उन्होंने पूछा कि पैकिंग हो गई क्या, मैंने सिर हिला दिया, फिर वो अँदर से अपना बैग लेकर आये और हम सबसे बोले कि कल एयरपोर्ट पर मिलते हैं और वो दोनों वँहा से निकल गये।
कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा, सभी जैसे अपनी अपनी जगह फ्रीज़ हो गये थे। मुझे काटो तो ख़ून नहीं, समझ में नहीं आ रहा था आख़िर ये हो क्या गया। जब अपने इर्द-गिर्द लोगों को देखा तो पाया कि सभी नज़रें चुरा रहे थे मुझसे। मेरे पैरों में जैसे जान ही नहीं रह गई थी, वहीं सीढ़ियों पर मैं बैठ गई। आस्था ने हाथ पकड़ कर उठाया और फैमिली रूम में ले गई। निशीथ पानी ले कर आये और डैडी को देखते हुए बोले कि "now she needs to know what is going on , she should not be kept in dark forever '.डैडी ने सहमति में हल्के से सिर हिला दिया था,उनके चेहरे पर लाचारी और बेबसी साफ़ झलक रही थी। मैं साँस रोके प्रतीक्षा कर रही थी इस राज़ को जानने का जिससे अब तक मैं अनजान रही थी।
          निशीथ नीचे कारपेट पर ही बैठ गये और मेरा घुटना थपथपाते हुए बोले,"भाभीजी,वो एमी है,अमित की हारवर्ड के दिनों की फ्रेंड,अम्म....  गर्लफ्रैंड कहना ज़्यादा ठीक होगा। दोनों शादी करने वाले थे पर डैडी एकदम नाराज़ हो गये अमित से और प्रेशर में आ के अमित ने उससे शादी नहीं की। वो बहुत ओबेडिएंट सन है लेकिन अपने प्यार को भी कभी भुला नहीं पाया। जब भी यँहा आता,दोनों की मुलाक़ात होती और दोनों साथ समय बिताते। हम लोग इसे अच्छा नहीं समझते हैं इसलिये आस्था और मैं दोनों काफ़ी दिनों तक ऐतराज़ करते रहे पर वो बोलता था कि उसके इस मेल-जोल से कभी आपके हक़ की अनदेखी नहीं करेगा। और एक बात,एमी कभी आपके सामने नहीं पड़ेगी और इससे आप दोनों के रिश्ते पर कोई आँच नहीं आने देगा। आप उसकी ज़िम्मेदारी हैं और वो अपनी ज़िम्मेदारी से कभी पीछे नहीं हटेगा। एमी अमित से उम्र में बड़ी है और उसकी भी शादी हो चुकी है,कोई बच्चा नहीं है और लास्ट ईयर उसके हस्बैंड की डेथ हो गई है। अब अकेली है और शायद इसीलिए डेस्पेरेट हो गई है,पर मुझे पूरा यक़ीन है भाभीजी कि अमित कभी आपको छोड़ कर उसके साथ नहीं जाने वाला है । "
इतना बोल कर निशीथ ने मेरी ओर देखा,मैं उसी तरह मूर्ति बन कर बैठी हुई थी। आस्था मेरे बगल में बैठ कर मेरे बालों में हाथ फेर रही थी,मम्मा -डैडी सिर झुका कर काउच पर बैठे थे। पता नहीं कितनी देर हम सब ऐसे ही बैठे रहे,फिर अचानक से मैं उठी और मैंने कहा कि "रात भर ऐसे ही बैठे रहना है क्या,चलिये सब लोग आराम करिये। " ये कहते हुए मैंने मम्मा की दवाओं के लिये गिलास में पानी निकाला और उनको पकड़ कर उनके कमरे में ले गई। मम्मा की तबीयत ख़राब हो जाती है वो ज़्यादा देर तक जग लें  तो,फिर आज तो बहुत स्ट्रेस भी हो गया है। उनको बेड पर बैठा कर जब मैं मुड़ने लगी तो मम्मा ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बहुत कातर स्वर में बोलीं "बेटा हमें माफ़ कर दो" . मैं अपना हाथ छुड़ा कर तेज़ी से बाहर निकल गई,अगर एक पल भी वँहा और रुकती तो मेरे आँसू सभी को दिख जाते।
वज्रपात होना ये मुहावरा बस पढ़ा था,आज जाना कि वज्रपात होने पर कैसा लगेगा। पूरा शरीर शिथिल पड़ गया,घाव की तरह से दुःख चुभने लगा लेकिन मेरे पास ये सब जीने का समय नहीं था,नवेली को भी कल वापस जाना था और मुझे सुबह उसको हँसते हुए विदा भी करना था इसलिये मेरा कम्पोज़ रहना बहुत ज़रूरी था। अगर मैं डिस्टर्बड दिखूँगी तो फिर मेरी बेटी कैसे ठीक रहेगी?
मैंने अलार्म लगाया और एक नींद की गोली लेकर सो गई। सुबह उठ कर जब फ़ैमिली रूम में आई तो मम्मा वंही बैठी थीं। मेरे नमस्ते के जवाब में उन्होंने पूछा कि "नींद आई थी बेटा ?' मैंने कहा "जी मम्मा सो गई थी। " "चलो अच्छा है,सोना बहुत ज़रूरी होता है। " चाय का पानी उबलने को रख दिया तब तक सभी लोग आ गये और बातचीत होने लगी। सभी सहज होने की कोशिश कर रहे थे पर सहज कोई नहीं था। ग्यारह बजे हम सब एयरपोर्ट के लिये निकले,नवेली ने आर्यन का हाथ पकड़े रखा था और नानी बन के उसे समझा रही थी कि "भाई तुम ठीक से रहना,अब हम जा रहे हैं। " ऐसा लग रहा था कि जैसे अब तक भाई की सारी ज़िम्मेदारी उसी के कन्धों पर थी!
एयरपोर्ट पर अमित आ चुके थे,आशा के विपरीत अकेले ही थे। लपकते हुए हमारी तरफ़ आये और मुझे देखते हुए नवेली से पूछने लगे,"ready to fly ?" उनकी नज़र ख़ुद से ही शर्मसार लगी। कुछ देर बाद उन्होंने मेरा हाथ पकड़ते हुए पूछा कि मैं ठीक तो हूँ! मैंने हाथ छुड़ाते हुए सिर सहमति में हिला दिया। वो मेरे हमकदम चलते रहे और एयरलाइन्स के काउंटर पर चले गये। बोर्डिंग पास लेकर वो लोग चेक इन के लिये जाने लगे तो मेरी आँखें एकदम नम हो गई, नवेली मुझसे चिपकते हुए बोली कि "मम्मा , आप आर्यन को एडमिट करा के आइये,आई विल बी फाइन विद नानी माँ,डैडी एंड बाबा ।  " मैंने उसे कुछ देर यूँ ही चिपकाये रखा और कहा "आई नो माई डॉल। " अमित ने फिर नवेली का हाथ पकड़ लिया और सबको यथा-योग्य दुआ सलाम करते हुए आगे बढ़ गये। मैंने देखा कि आर्यन एकदम नॉर्मल था,बल्कि उसे घर जा कर प्रथम के वीडियो गेम खेलने की जल्दी थी। हम लोग वापस जाने लगे और रास्ते भर मैं ये सोचती रही कि इन बच्चों और मुझमें कितना फ़र्क़ है, मम्मी पापा से अलग होने का ख़याल आते ही मेरे आँसू निकलने लगते थे,और ये.......
रूटीन संडे की दिनचर्या के बाद जैसे तैसे रात हुई,सब लोग अपने अपने कमरों में चले गये। कमरे के सूनेपन में हजारों घाव टीसने लगे जो बड़ी हिम्मत से मैंने दबा छुपा लिये थे। वफ़ा के बड़े बड़े वादे तो कभी नहीं किये थे अमित ने,लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि मेरा ख़याल नहीं रखते। मैं एक अच्छी डॉक्टर थी लेकिन नामी डॉक्टर शायद उन्हीं की बदौलत बनी। शहर में बेहद मॉडर्न नर्सिंग होम का तोहफ़ा दिया था पहली एनीवर्सरी पर। मेरी कोई ज़रूरत ही नहीं बची सालों से क्योंकि हर चीज़ बिना माँगे ही मिल जाती थी। हम दोनों की रुचियाँ अलग अलग रहीं इसलिये साथ समय नहीं बिताया ज़्यादा लेकिन फिर भी कभी इतना अकेलापन नहीं महसूस हुआ जितना आज हो रहा है। कल जब वो दूसरी औरत के साथ मेरी आँखों के सामने चले गये तो मुझे लग रहा है कि अपना सब कुछ हार गई हूँ मैं। अपमान,अभिमान,दंश और बेवफाई न जाने कितने ज़ख्मों से आहत पड़ी हूँ। एक पत्नी के दिल में बेवफाई की टीस है,एक दबी हुई चीख़ है और है एक आहत स्वाभिमान। दिल के तार झनझना झनझना के विद्रोह कर रहे हैं लेकिन दिमाग़ शिथिल है,घायल तो है पर संयत है। मैंने अपने सारे अहम् फ़ैसले दिमाग़ से किये हैं,इसलिये ये फ़ैसला भी उसी पर छोड़ूंगी। अपने विचारों को यहीं विराम देते हुए आज फिर एक नींद की गोली लेकर मैं सोने लगी हूँ।
सुबह कॉल आई कि वो लोग ख़ैरियत से दिल्ली पँहुच गये हैं। मैंने बात नहीं की और तब Wi Fi नहीं होता था,टेलीफोन लाइन से ही कम्प्यूटर कनेक्टेड होता था फैक्स की तरह,तो अपने पर्सनल फ़ोन पर बात करने का सवाल ही नहीं पैदा होता था।
दो महीने भी गुज़र ही गये लेकिन एक एक पल पहाड़ जैसा। वक़्त काटे नहीं कटा। आर्यन यँहा के माहौल में एकदम रच बस गया,प्ले स्टेशन,x box ,गेम बॉय,निनटेंडो डी एस वग़ैरह ने घर में और चक्की चीसेज़ ,brunswick ज़ोन और रेज़र टैग जैसे आउटडोर प्लेसेस ने पूरे टाइम बिज़ी रखा। मैं देख रही थी कि अब वह मेरे साथ कहानी सुनना या किसी और तरह समय बिताना ही नहीं चाहता। जैसे प्रथम पूरा वक़्त या तो अपने कमरे में गेम खेलते या फ़ोन पर अपने दोस्तों से गप -शप में बिताता है वैसी ही आदत आर्यन की भी पड़ती जा रही है। यँहा पेरेंट्स और बच्चों में एक दूरी सी बन गई है,मैंने नोटिस किया कि निशीथ और आस्था जब अपने काम से लौट कर घर आते हैं तो एक फॉर्मल बातचीत बच्चे के साथ करके अपने अपने तरीक़े से रिलैक्स होते हैं। यँहा इसको पर्सनल स्पेस देना कहते हैं। छुट्टी में सबकी अपनी अलग अलग एक्टिविटी होती है और बच्चे के लिये उसकी पसँद की एक्टिविटी कराने किसी हाई स्कूलर को पार्ट टाइम दे कर बुला  लिया जाता है,उसकी एक्स्ट्रा पॉकेट मनी हो जाती है और सबको अपनी मनमर्ज़ी करने की आज़ादी! मैंने सोच लिया कि यँहा नवम्बर तक रुक के इसे एडजस्ट कराने की तो कोई ज़रूरत ही नहीं है,ये तो एकदम एडजस्टेड है। फिर बेकार रुकने का क्या फ़ायदा?
दो सितम्बर को स्कूल का पहला दिन,आर्यन रेड टी शर्ट और डार्क ब्लू डेनिम शॉर्ट्स पर पोकेमोन बैकपैक के साथ तैयार हो के बस स्टॉप चला। हवा से उसके माथे पे बिखरी घुँघराली लटें लहरा रही थीं। बहुत प्यारा लग रहा था। स्कूल बस घर के बाहर वाली सड़क पर आई,अपना बैकपैक लेके मास्टर आर्यन उसपे चढ़ गये। कोई रोना धोना, कोई डरना नहीं,बहुत उत्साहित थे वो ! मैंने भी वेव करके विदा किया,चार घँटे बाद छुट्टी हो जानी है,ये सोच के कुछ राहत लगी। नवेली तो पहले दिन बहुत रोई थी स्कूल जाते वक़्त जब उसे स्कूल गेट पर छोड़ा था। मेरे भी आँसू निकल पड़े थे जिसे देख कर अमित कई दिनों तक चिढ़ाते रहे थे; "ये देखो भई ,बच्ची से ज़्यादा तो मम्मी रो रही है !" पौने चार बजे बस घर के दरवाज़े पर आ गई,मैं और मम्मा सड़क पर खड़े हुए थे उसे रिसीव करने,प्रथम भी था और हमारे जाने के बाद उसी की ड्यूटी लगनी थी आर्यन को बस से रिसीव करके घर के अन्दर लाने की,वो मिडिल स्कूल में था इसलिये उसकी स्कूल टाइमिंग फ़र्क थी,वह जल्दी जा के elementary स्कूल के बच्चों से पहले आता था। आर्यन बस से उतर के दौड़ के मेरी गोदी में चढ़ गया। फिर तुरन्त ही नीचे उतरा और घर में घुसते ही गेम खेलने की ज़िद करने लगा। स्कूल की कोई यूनिफार्म नहीं होती यँहा ,इसलिये कपड़े तो नहीं बदलवाने थे लेकिन उसे डाँट के पहले हाथ धुलवाया,फिर दूध और पॉप टार्ट दिया खाने को । ये भी समझाया कि बाहर से आ के पहले हाथ धोना है और स्कूल से लौट के पहले मिल्क और स्नैक्स खाना है। उसने आधा सुना आधा नहीं,जल्दी से फिनिश करके "mom can I go now "कहते हुए बिना जवाब का इंतज़ार किये रूम की तरफ़ भाग गया। तीन महीने में उसकी अंग्रेजी स्पीकिंग यहीं के जैसी fluent हो गई थी। इंडियन एक्सेंट भी बहुत कम रह गया था।
एक हफ़्ते में उसका रूटीन एकदम सेट हो गया था। बच्चे बहुत जल्दी सीखते हैं और नये माहौल में एडजस्ट भी तुरन्त कर लेते हैं। मुझे वापस जाने की बेचैनी होने लगी। नवेली वँहा मज़े में थी,मेरा नर्सिंग होम भी सही चल रहा था लेकिन अब ख़ाली बैठे बैठे यँहा मन ऊबने लगा था। उसपर सबसे महत्वपूर्ण बात कि मेरी यँहा पर कोई ज़रूरत भी नहीं थी। शाम को डाइनिंग टेबल पर जब सब बैठे तो मैंने अपना इरादा बताया। आस्था और निशीथ बोले कि इतनी जल्दी क्या है वापस भागने की,अभी बहुत जगह रह गई हैं यँहा घूमने को,इस समय स्मोकी माउंटेन बहुत सुन्दर हो जाता है,मिड अक्टूबर में वँहा का प्लान है घूमने का,लेकिन मैं अब और रुकना नहीं चाहती थी। मम्मा ने कहा कि वह भी साथ चलेंगी,दिन भर घर में अकेले रह कर बोर हो जायेंगी। आस्था कुछ रूठ के अपनी असहमति दिखा रही थी पर मैंने उसे समझाया कि ख़ाली बैठे बैठे इन्सान दुःखी हो जाता है,छुट्टी एक सीमा तक ही अच्छी लगती है और काम करने वाला इन्सान ऐसे ख़ाली नहीं बैठ सकता। बात तो वो समझ ही रही थी,बोली " हाँ भाभी,I agree , but rest assured that Aryan would be perfectly all right here,we will take good care of him". मैंने कहा कि "आई डोंट हैव अ दिंट ऑफ़ डाउट माई डिअर" ! तो हमारे फ्लाइट प्रीपोन कराने की बात तय हो गई।
शनिवार को हमारी फ्लाइट थी,आर्यन को बहुत देर तक पुचकारती रही,वो भी आज वीडियो गेम की तरफ़ नहीं भागा ,शाँति से मेरी गोद में बैठ कर मुझसे बातें करता रहा। बातें खेल से सम्बन्धित किरदारों की जैसे पीचू ,पिकाचू ,पूह ,मिकी माउस,डोनाल्ड डक और स्कूल में बने उसके नये फ्रेंड्स की। मैंने उसकी सभी बातें ध्यान से सुनीं और एक बात उससे पहली बार कही। वो ये कि उसे यँहा हम पढ़ने के लिये और जीवन में सब कुछ टॉप का पाने के लिये लाये हैं,लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हमारा साथ छूट रहा है। हम लोग एक फ़ैमिली हैं और कभी किसी वक़्त भी उसे कोई ज़रूरत हो,उसके पास मिलेंगे। जीवन में कई बार कुछ फ़ैसले नहीं चाहते हुए भी लेने पड़ते हैं लेकिन वो अपनों के भले के लिये ही होते हैं। पता नहीं उसने कितना ग्रास्प किया इन बातों को,लेकिन चुपचाप सुनता रहा था।मन भारी हो चला था,एक गिल्ट अपने आप में कि आज के बाद इसके साथ कितना समय बिता पाऊँगी,वो उम्र जिसमें सँस्कार डाले जाते हैं बच्चों में,वो पूरी की पूरी उम्र ही अपने हाथों से निकल गई। कल जब ये बड़ा होकर कुछ भी या कैसा भी इन्सान बनेगा, उसमें अपना शायद ही कोई योगदान होगा। ख़ैर ,यही नियति को मंज़ूर है तो फिर क्या कर सकते हैं।
बोझिल मन से सबको अलविदा कह के मैं और मम्मा चेक इन के लिये आगे  बढ़ गये। हमारी फ्लाइट टाइम पर थी, लेने के लिये दिल्ली में अमित आये थे। उस रात हम वँहा होटल में रुके थे। हम लोगों की इतने दिनों से कोई ख़ास बात नहीं होती थी,मैं असल में उन्हें अवॉयड कर रही थी। तो आज पहली बार अकेले में होटल के कमरे में एक दूसरे को फेस करने का मौका मिला था। फ्रेश होकर जब मैं बाथरूम से निकली तो अमित बेसब्री से मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मुझे थकान हो रही थी और मैं सोना चाहती थी लेकिन अमित ने हाथ पकड़ के अपने पास खींच लिया। बिना कोई भूमिका बाँधे उन्होंने कहा, "आई नो आई हैव हर्ट यू इममेंसेली बट इट वाज़ नॉट इंटेंशनल। मैं कभी ऐसा कुछ करना नहीं चाहता था, बेशक़ शादी के लिये तुम मेरी पहली चॉइस नहीं थी लेकिन इतने सालों में तुम मेरी आदत बन गई हो ये तो मैं जान चुका था, नहीं जानता था तो बस ये कि जब मेरी वही चॉइस मेरी बीवी के सामने मुझे मिल जायेगी तो मुझे अपनी पसँद पे शर्म आयेगी। तुम्हारी वो नज़र मुझे आज भी अन्दर तक चीर देती है जिसमें एक अनजान डर ,घबराहट,आश्चर्य और अविश्वास और भी पता नहीं क्या कुछ था। तुमने आज तक मुझसे इस बारे में कोई बात नहीं की लेकिन मैंने उसी मोमेंट ख़ुद से वादा कर लिया कि अब से मैं एमी आई मीन उस औरत से कोई कॉन्टैक्ट नहीं रखूँगा। एक समय में हमने बहुत टूट के मोहब्बत की थी,उसी नाते से जब मैं यू एस जाता था,हम मिल लिया करते थे। बट ट्रस्ट मी, तुमसे शादी के बाद मैंने कोई सीमा क्रॉस नहीं की,वी वर जस्ट फ्रेंड्स। तुम्हारी उस एक नज़र ने मुझे हमेशा के लिये तुम्हारा ग़ुलाम बना दिया है। ... नहीं,मुझे अपनी बात अभी ख़त्म करनी है। जानता हूँ तुम्हे सब ड्रामा लग रहा होगा लेकिन इतना भी कमीना मत समझना कि मेरी किसी बात की कोई क़ीमत ही न हो। मेरी तरफ़ से तुम्हें आज से कोई शिक़ायत नहीं होगी सुरेखा एंड आई प्रॉमिस दिस। " कमरे में सन्नाटा रहा कुछ देर,फिर मैंने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा "ओके गुड नाईट। " "क्या हुआ,कुछ बोलोगी नहीं?" अमित ने साश्चर्य पूछा।  "नहीं,मुझे नींद आ रही है" और मैंने लेट कर कम्फर्टर ओढ़ लिया।
बोलने को कुछ था ही नहीं मेरे पास,समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे रियेक्ट करूँ,बस इसीलिये मुँह ढक कर लेट गई थी। नींद तो क्या ख़ाक़ आ रही थी! इतने सालों का साथ था,एकदम से तोड़ने का फ़ैसला मुझसे नहीं हो पा रहा था। सुबह हमारी ट्रेन थी इलाहबाद, जो अब प्रयागराज कहलाता है, के लिये। घर पहुँच कर मम्मी और नवेली दोनों से गले मिलते हुए आँखें भर आई थीं,मम्मी ने सोचा होगा कि आर्यन से बिछड़ने के आँसू हैं शायद,मेरी पीठ सहलाते हुए मुझे देर तक उन्होंने गले से लगाये रखा।
इतने महीनों से अर्चना से कोई सम्पर्क नहीं हुआ था,उस ज़माने में जैसा मैंने पहले कहा,WI FI   नहीं होता था और ई -मेल से ख़ैरियत की ख़बर दे दी थी। मेरे आने की सूचना उनको मिल चुकी थी और वो शाम को प्रशस्ति को लेके मिलने आ गईं। काली-हरी फ्रिल वाली फ्रॉक में तैयार प्रशस्ति और भी प्यारी लग रही थी। इतने महीनों के अन्तराल के बाद हम मिले थे,उसने पहचान तो लिया था लेकिन पास नहीं आ रही थी,अपनी मम्मा के पीछे छुप के मुझे देख रही थी। हम लोग ड्रॉइंग रूम में बैठने आ गये। अर्चना ने उससे कहा कि "नमस्ते नहीं किया बेबी तुमने आंटी को" तो तुरन्त उसने अपने दोनों छोटे छोटे हाथों को जोड़ के नमस्ते की मुद्रा बनाई। मैंने अमेरिका से लाये हुए कुछ उपहार उसको दिये तो पहले तो उसने कोई बाल सुलभ उत्सुकता नहीं दिखाई उन्हें लेने की,लेकिन जब उसकी मम्मा ने इशारा किया कि ले लो तो हाथ बढ़ा दिया। हाथों में बैग पकड़ते ही उसने कहा "धन्यवाद"! मेरे कान खड़े हो गये ,एक पल को संदेह हुआ शायद मैंने ठीक से सुना नहीं। इतनी छोटी बच्ची ये शुद्ध हिन्दी का शब्द कैसे बोल सकती है,इसका न तो प्रचलन है,न हमारे घरों में कोई बोलता है,अंग्रेजी का थैंक्स,थैंक यू ही बच्चे तो क्या,हम बड़े भी बोलते हैं। मुझे समझ नहीं आया कि यू आर वेलकम बोलूँ कि नहीं। मेरे असमंजस को देख कर अर्चना ने कहा कि प्रशस्ति बहुत अच्छी हिन्दी तो बोलती ही है,उसे सँस्कृत के कई श्लोक भी अच्छे से याद हो गये हैं,अभी मेरा मुँह आश्चर्य से खुला ही था कि उन्होंने अगला फायर किया,"इसको हमने सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल में एडमिट करा दिया है, वँहा से बहुत कुछ सीख रही है।" मेरा आश्चर्य से खुला मुँह तो खुला ही रह गया और दिमाग़ को जैसे झटका सा लगा। आज कल तो फोर्थ क्लास वाले भी अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने लगे हैं और ये इस क्लास में हो के,जिनकी दो बड़ी बेटियाँ वेल्हम में पढ़ रही हैं,उन्होंने किस दुश्मनी में अपनी सबसे छोटी बच्ची को ऐसे हिंदी मीडियम स्कूल में डाल दिया,मुझे समझ ही नहीं आ रहा था। आख़िर बड़ी हो के कितने काम्प्लेक्स का शिकार इसे होना पड़ेगा,कितने लोग सोसाइटी में इसका मज़ाक़ बनायेंगे,हायर स्टडीज़ में ख़ासकर साइंस में जितनी भी अच्छी किताबें हैं वो सब इंग्लिश में हैं और मेडिकल और इंजीनियरिंग फ़ील्ड की टर्मिनोलॉजी भी अंग्रेज़ी में है,कैसे ये इन सब चीज़ों से कोप करेगी,और तो और,आजकल शादी के लिये भी जाओ तो लड़के इंग्लिश स्पीकिंग लड़की चाहते हैं,बीस पच्चीस साल बाद तो इस तरह के स्कूल में पढ़ी लड़की अजूबा ही कहलायेगी। माना कि प्रशस्ति इनकी planned baby नहीं है लेकिन है तो इनकी ही संतान,  फिर अपनी बड़ी बहनों के मुक़ाबिल कँहा खड़ी होगी ये? मेरी सोच मौन थी,इस चुप्पी को तोड़ते हुए अर्चना बोलीं , "आजकल बच्चों में संस्कारों की बेहद कमी होती जा रही है,हम लोगों से ज़्यादा कौन महसूस करेगा,देश के बेस्ट कान्वेंट में दोनों बड़ी बेटियों को पढ़ा रहे हैं लेकिन एक अजब टाइप की हो गई हैं दोनों,न बडों का आदर,न कोई अपनापन, न अपनी संस्कृति का सम्मान और न धर्म के लिये आस्था। सब कुछ उधार का,दोष अपना ही है,जिस जगह डाला है वँहा से ही सीखेंगी न उनकी तहज़ीब। जैसे ब्रेन वॉशिंग हो गई हो,इसलिये सोचा कि प्रशस्ति को भारतीय सँस्कार और भाषा के स्कूल में पढ़ा के देखें। " मैंने कहा कुछ नहीं बस मन ही मन सोचा कि हाँ क्यों नहीं,ये तो वैसे भी एक्सपेरिमेंटल चाइल्ड है,सारे प्रयोग तो इसी पे करने हैं !तो इस तरह प्रशस्ति की पाठशाला का शुभारम्भ हुआ,प्रार्थना रहेगी कि उसकी जीवन यात्रा में इससे बहुत भारी नुकसान न होने पाये।
                                                                                क्रमशः
                                                                         आरती श्रीवास्तव



(अध्याय 10 )                                    बरसात की वो रात  शाम को कुछ बूंदा-बांदी होने लगी। रात तक घनघोर बारिश के आसार थे। ऐसी जाड़े की...