(अध्याय 9 )
तीसरी नदी से आसमान की सीढ़ी !
दिसम्बर का महीना लग चुका था। सर्दी काफ़ी बढ़ गई थी। आज Monday को मैंने अर्चना के मोबाइल पर कॉल किया, बहुत मुश्किल से कनेक्ट हुआ, शायद roaming की वजह से, उस समय आज के जैसे प्लान और कनेक्शन नहीं हुआ करते थे, मोबाइल इंडस्ट्री अपनी initial स्टेज पर थी। ख़ैर, कई बार मिलाने पर आख़िरकार फ़ोन मिल ही गया। अर्चना ने बताया कि वो लोग ठीक से पँहुच गये हैं और दो दिन लखनऊ में राजभवन कॉलोनी में घर सेट करवा कर वो डिबरूगढ़ के लिये रवाना हो जायेगीं। और हाँ, मम्मा और बेबी से हमेशा टच में रहने के लिये उन्हें एक नोकिया का मोबाइल कोरियर करवा रही हैं, लैंड लाइन का तो भरोसा नहीं है, कभी कोई इमरजेंसी हो गई तो भगवान ही मालिक है। अब उन्हें दोनों को यूँ अकेले छोड़ के बहुत डर लग रहा था। कहने लगीं कि कोई भरोसे का नौकर मिले बिरजू काका जैसा, उनके गाँव का, हस्बैंड वाइफ हों, तो लगवा दूँ वहाँ, मियाँ बीवी मिल के अन्दर बाहर दोनों तरह के काम देख लेंगे। मैंने सोचा आईडिया तो अच्छा है, इस तरह रात बिरात कोई ज़रूरत पड़ी तो चिन्ता की बात नहीं होगी। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि इंतज़ाम हो जायेगा इसका भी, फिर गोविन्द को अलोपी बाग़ ये कुशल की ख़बर मम्मा को देने के लिये भेज दिया।
रात को नर्सिंग होम से घर आकर बिरजू काका से बात की। उनके गाँव में क्या कोई ऐसा है जो शहर में काम कर ले, पति-पत्नी हों, अंदर बाहर दोनों देख लें, रहना और खाना फ्री, पगार भी अच्छी मिलेगी और काम ढंग का रहा तो सरकारी नौकरी में भी लगवाया जा सकता है। बिरजू काका ने बताया कि कई लड़के हैं जो रोज़ी रोटी की तलाश में गाँव से बाहर निकलते हैं, कोई भरोसे का जोड़ा देख कर जल्दी ही बतायेंगे। जब मैंने बताया कि छटंकी के घर लगवाना है, वो और उसकी नानी अकेले रह रहे हैं, वक़्त बेवक़्त कोई ज़रूरत हो तो कहाँ जायेंगी, तो वो बहुत फिक्रमंद हो गये और बोले कि तब तो जल्द से जल्द तलाशना पड़ेगा। "बहूरानी, आप जिन फिकर करें, हम जल्दी बताइबे " ये बोले बिरजू काका। बिरजू काका अमित के बचपन से यहाँ काम करते थे और इन लोगों की जो ज़मींदारी हुआ करती थी पहले, वहाँ से आते थे। पुश्त दर पुश्त से उनके बाप दादा यहाँ काम कर रहे थे तो एकदम परिवार के सदस्य जैसे ही थे। इसीलिये अमित और आस्था इनको बचपन से काका बोलते हैं और शादी के बाद जब मैं इस घर में आई तो मैंने भी इनके पैर छुए थे। बहुत ही स्नेह और अपनत्व मिला इनसे और कभी हम लोगों ने एक दूसरे को महसूस नहीं होने दिया कि परिवार के सदस्य नहीं हैं। मुझे यक़ीन था कि बिरजू काका जल्दी ही कोई भरोसेमन्द परिवार दिलायेंगे।
पाँच दिनों के अन्दर ही बिरजू काका ने अपने बेटे के साथ एक दम्पति अवधेश और रानी को बुला लिया। दोनों पति-पत्नी 25 से कम उम्र के थे। इंटर पास थे दोनों, उसके बाद पढाई छोड़ दी थी। प्रेम विवाह किया, इसलिये परिवार वाले नाराज़ हो गये थे, अवधेश ने मुम्बई जाकर एक डेढ़ साल सब तरह का काम किया है, होटल में बर्तन धोने से लेकर खाना पकाने तक, गाड़ी चलाने से लेकर स्कूल में चौकीदारी तक, और अभी गाँव आया है अपनी बहन की शादी में, बिरजू काका के परिवार से ख़बर लगी कि साहब लोग एक ऐसी ही जोड़ी तलाश कर रहे हैं काम करने के लिये, तो साथ साथ रहेंगे और रहना खाना मुफ़्त होगा, ये नौकरी करने के लिये तुरन्त चले आये। बिरजू काका ने बताया कि बहुत मेहनती लड़का है और होशियार भी, सब काम अच्छे से सम्हाल लेगा। बिरजू काका का आदमी है, यही काफ़ी है इस कपल को नौकरी पर रखवाने के लिये, आज Saturday है, कल सुबह इतवार को दोनों को अलोपी बाग़ लेकर चलूँगी।
रात में डिनर के बाद आर्यन से बात की। आजकल आर्यन हिन्दी बोलने पर बहुत ध्यान दे रहा है। मुझसे बात करते समय यही कोशिश करता है कि इंग्लिश का कोई शब्द न बोले, ऐसे में कभी कभी गज़ब हो जाता है!
"कैसे हो बेटा ?" मैंने हमेशा की तरह बात शुरू की।
"अच्चा हूँ, आप कैसे हे?"
"हम भी अच्छे हैं, क्या नया हो रहा है आजकल?"
"कब स्काउट जॉइन किये, उसमें स्कीइंग के लिये ले जा रहे अगले वीक, मस्ती आयेगा !"
"मस्ती आता नहीं, आती है। ठीक है। बुआ को तंग तो नहीं करते न?"
"नई, पता है बुआ फूफ़ाजी इनडोर बारबेक्यू कर रहे आज, मैं गरम कुत्ता खाउंगा। "
एक सेकेंड मुझे फिगर आउट करने में लगा, फिर बेतहाशा हँसी निकल पड़ी! आर्यन ने हॉट डॉग का literally ट्रांसलेशन कर दिया था।
"अरे इतनी भी शुद्ध हिन्दी बोलने की ज़रूरत नहीं है तुम्हे, हॉट डॉग को हॉट डॉग ही बोलो! हिन्दी बहुत उदार भाषा है, उसमें कई भाषाओं के शब्द आसानी से, नैचुरली समां जाते हैं। ठीक है?"
"टीक, आज कोन कानी सुना रही हैं मॉम ?"
"आज राजा हरिशचंद्र की कहानी सुनाऊँगी। भारत में समय को चार युग में बाँटा गया है, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग। तो सतयुग में थे राजा हरिशचंद्र ......... "
इस तरह एक कहानी के साथ आर्यन के साथ वीडियो चैटिंग ख़त्म हुई। अमित आज पूरे टाइम वहीं बैठ कर हम माँ बेटे की बातों का मज़ा लेते रहे। फिर संडे को क्या क्या किया जाये, इसपर बात करने लगे। कल रात में अग्रवाल अंकल (जस्टिस राम कृष्ण अग्रवाल डैडी के फ्रेंड हैं और उनके बेटे संदीप अमित के) घर डिनर है। वहाँ जाना तो ज़रूरी है, दिन में क्या और करना है ये सोचना था। मैंने कहा कि कल अलोपी बाग़ जाना है और वहाँ से संगम पर बोटिंग की जा सकती है। अमित ने तुरन्त हाँ कर दी और हम लोग सोने चले गये।
संडे का दिन हम सबके लिये रिलैक्सेशन का होता है। आज इत्मिनान से ब्रंच करने का अपना ही मज़ा होता है। वर्ना रोज़ की भागमभाग में एक साथ डाइनिंग टेबल पर एक दूसरे के साथ धीरे-धीरे चाय सिप करते हुए बातचीत कहाँ हो पाती है! हमेशा की तरह ब्रंच का भी बेसब्री से इंतज़ार रहता है। आज सॉसेज, हेशब्राउन, पैनकेक, स्ट्रॉबेरी स्मूदी और रवा इडली-सांभर , वेज मोमो चटनी के साथ और पाइनएप्पल हलवा सर्व हुआ। सभी के लिये पसन्द का कुछ न कुछ, बिरजू काका menu में एक्सपर्ट हो गये हैं। उनको अब कोई कुछ बताता नहीं है, अपने से डिशेस रोटेट करते हैं और ऐड भी करते रहते हैं। ये सारा हुनर वो हमारे यहाँ इतने सालों से काम करते करते सीख गये हैं। ढेरों पार्टियों में बनवाई जाने वाली स्पेशल चीज़ें कैसे और कब कुक से बनवानी हैं, उनको बताने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
मम्मा को अपनी फ्रेंड के यहाँ जाना था और नवेली की फ्रेंड्स घर आ रही थीं। डैडी आज दिन में घर पर ही रहना चाहते थे। तो हम दोनों ब्रंच के बाद अवधेश और रानी को लेकर निकल पड़े। अर्चना की मम्मा को सुबह ही बता दिया था कि डोमेस्टिक हेल्प का इंतज़ाम हो गया है और दिन में हम लोग उन्हें ला रहे हैं।
अलोपी बाग़ पहुँच कर अवधेश-रानी का परिचय कराया गया। छुटकी हम लोगों का बाहर ही इंतज़ार कर रही थी। बहुत स्नेही बच्ची है, उससे मिलकर अलग होने का मन ही नहीं करता। नमस्ते करके हम दोनों की उँगली पकड़ कर अंदर ले गई। मम्मा अमित को भी आया देख कर बहुत ख़ुश हुईं। कुछ देर बातें करके हम लोग निकलना चाह रहे थे लेकिन मम्मा खाने पर रोक रही थीं। हमने अपने पेट का हाल बताया और कहा कि हमारा नाश्ता-खाना दोनों हो चुका है और अब ज़रा भी गुंजाइश नहीं है, तो बमुश्किल केवल कॉफ़ी पर राज़ी हुईं।
छुटकी के लिये ब्रंच नया शब्द था। उसकी उत्सुकता और उसके सवाल.....
"मौसाजी, आप दिन का खाना इतवार को क्यों नहीं खाते ? प्रशस्ति तो हर दिन खाती है!"
"बेटे, हम ब्रंच करते हैं संडे को, जिसे ब्रेकफास्ट और लंच दोनों समझ लो, इसीलिये उसे ब्रंच कहते हैं। "
" ओह, यानि बी और आर breakfast से और यू एन सी एच lunch से लेके ब्रंच बन गया । है ना मौसाजी। "
"करेक्ट! यू आर अ क़्विक लर्नर !"
"धन्यवाद। "
अमित मुस्कुरा दिये। इतनी छोटी बच्ची के मुँह से जो भी ये शब्द पहली बार सुनेगा, उसे अनोखा अनुभव होगा।
कॉफ़ी आई और मम्मा बहुत शुक्रिया करने लगीं इतनी जल्दी अवधेश और रानी को काम पे लगवाने के लिये। वो दोनों भी ख़ुश थे अपनी मनपसन्द तनख़्वाह तय होने से, साथ में ऊपर एक कमरा था अटैच्ड बाथरूम के साथ उनके रहने के लिये । ऊपर जाने की सीढ़ी भी बाहर से थी तो हर तरह से दोनों लोगों के लिये अच्छा था।
हम लोग संगम जाने के लिये उठे तो प्रशस्ति ने पूछा कि क्या वो भी चल सकती है?
मम्मा ने कहा कि "अरे इन दोनों को जाने दो, तुम क्या करोगी बिटिया?"
लेकिन मैंने कहा कि कोई दिक्क़त नहीं है, थोड़ी देर में वापसी पर छोड़ते जायेंगे।
वो झटपट अपनी नानी के साथ अन्दर गई और जीन्स और वूलेन टॉप पहन कर तैयार हो गई। साथ में हैट, एकदम गुड़िया या कैलेंडर किड लगती है!
संगम की दोपहर, विशाल नदियों का अनूठा मिलन ! गँगा का सफ़ेद चमकता पानी और उससे मिलता हुआ यमुना का हरा पानी, यहीं पर अदृश्य मिथिकल सरस्वती नदी, एक रोमांचक एहसास पैदा करते हैं मन में। मन करता है इन असीम सी लगने वाली लहरों का नाच यूँ ही बस देखते रहें। हम लोगों ने एक अच्छी बोट की और उसपर बैठने के समय अमित ने प्रशस्ति को गोद में उठा लिया। प्रशस्ति अपनी नानी के संग संगम तो हमेशा आती रही है लेकिन बोटिंग पहली बार करने वाली है।
साइबेरियन गल्स के लिये हम खाना ले आये थे। नौका में बैठ कर उनको खाना दाना खिलाते हुए हम लोग क़रीब एक घण्टा प्रकृति के साथ आनन्द उठाते रहे। दिन का समय था, सुनहरी धूप भी थी, छुटकी को मैंने poncho भी पहना दिया ताकि उसे सर्दी न लगे। "मौसी, तीसरी नदी क्यों नहीं दिखती? क्या उसका रंग भी अलग था जैसे गँगा और यमुना का है? उसने पूछा।
"मालूम नहीं बेटा, कई हज़ार साल पहले ही वो सूख गई थी शायद। " मुझे इसके बारे में कुछ ख़ास पता नहीं था।
"अच्छा। मौसी, वो देखिये, प्रशस्ति को आकाश छूना होगा! वहां एक बड़े से टेबल पर स्टूल और सीढ़ी लगा कर प्रशस्ति उसे छू लेगी। वहां आसमान नीचे आ गया है। " उसने क्षितिज को देखते हुए कहा।
"नहीं प्रशस्ति, आसमान हमेशा इतना ही ऊपर हर जगह से है जितना तुम्हारे सर के ऊपर दिखता है। सच पूछो तो ये जो छत या छाता जैसा नीला नीला दिख रहा है, एक्चुअल में वो है ही नहीं। " मैंने बताया।
प्रशस्ति का मुँह अचम्भे से खुल सा गया। "अ औ.... , तो क्या कोई आसमान तक सीढ़ी से नहीं गया जैसे पाताल में गया है?"उसने पूछा।
"नहीं भई, लेकिन पाताल में भी सीढ़ी नहीं जाती। ये जो पृथ्वी है, इसके अन्दर बहुत तेज़ आग धधकती है, इसलिये ज़मीन के बहुत नीचे भी कोई नहीं जा सकता। " अमित बोले।
" नहीं-नहीं, मौसाजी, आपको पता है रावण जो था ना, वो पाताल लोक जाता था। उसका भाई अहिरावण लंका युद्ध के समय राम जी और लक्मण जी को उठा के पाताल ले गया था। टीवी पे दिखा रहे थे वो सीढ़ियां मिली हैं लेकिन आज भी बहुत नीचे नहीं जा पाये वो लोग, उनको सांस नहीं आ रही थी। उतनी दूर जाने का ऑक्सीजन नहीं रख सकते, तो बताइये तब कैसे जाते रहे होंगे? ये तो तय हो गया वो लोग हमारे विज्ञान से बहुत आगे थे!" प्रशस्ति ने जवाब दिया।
हम दोनों एक दूसरे को देखने लगे! अमित ने छुटकी को आज ही जाना हो जैसे। इतने छोटे बच्चे का तर्क, इमेजिनेशन, मेमोरी और नॉलेज अनूठा था। गॉड गिफ़्टेड बच्ची है ये सच में! हमारा नाव वाला इसकी बातें सुनकर बोला, "साहब, ई बिटिया तो देवी हैं देवी, कउनो बच्चा अइसन नाही होइहें। "
उसकी बातों में एक घण्टा कब बीत गया, पता ही नहीं चला। हमने उसे उसके घर ड्रॉप किया और वापस आते समय उसी के बारे में बात करते रहे। तीसरी नदी से आसमान की सीढ़ी वाला ये नौका विहार ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगा!
Awesome ...very capturing plat and captivating style of writing. Just feel too engrossed while going through it. Please write next chapters soon. Desperately waiting.
ReplyDeleteThank you Ila for your feedback. I always wait for it anxiously.
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