Wednesday, June 16, 2021

 (अध्याय 6 )

                              दावत

सुबह जब नाश्ते के लिये सब लोग इकठ्ठा हुए तो सबके पास अपनी अपनी ढेरों बातें थीं। हम सब कुछ देर से उठे थे, नवेली अभी नहीं लौटी थी, लंच के बाद उसे पिक करना था।आज Sunday था इसलिये ब्रंच लाज़मी था। वैसे तो रोज़ हमारे यहाँ कॉन्टिनेंटल ब्रेकफास्ट होता है, लेकिन Sunday को बिरजू काका मेरे लिये देसी नाश्ता बनाते हैं। ऐसे ही बातों बातों में कुछ साल पहले मैंने उनसे कहा था कि मुझे पूड़ी आलू, जलेबी समोसा जैसी चीज़ें संडे को नाश्ते में पसन्द हैं और मायके में हमारे यहाँ ऐसा नाश्ता छुट्टियों में ज़रूर बनता था। फिर क्या था, बिरजू काका हर संडे मेरे लिये ऐसा कुछ ज़रूर बनाते हैं! और अब तो अमित भी ये नाश्ता पसंद से करने लगे हैं। मम्मा डैडी को तो ये सब पसंद नहीं है, लेकिन थोड़ा बहुत ले लेते हैं इसमें से भी। तो आज उन्होंने चीज़ एंड कॉर्न सैंडविचेज़ , रवा इडली और टमाटर की चटनी और गोभी का पराठा और हरी चटनी बनाई है, जो बहुत स्वादिष्ट है। अमित चटखारे ले कर खा रहे थे तो मम्मा ने चुटकी ली, "तुम्हें कैसे  इतनी तीखी चटनी पसंद आने लगी भई ?" अमित ने झटपट जवाब दिया, "जैसे डैड को हिंदी classics पसंद आने लगीं मम्मा !" डैडी ठहाके लगा के हँस पड़े और मम्मा हँस कर बोलीं, " बहुत सही जा रहे हो बेटा, इसी रास्ते को पकड़े रहना!"

 डैडी ने कल की पिक्चर के बारे में कहा कि बहुत रोने पीटने वाली मूवी थी, मीना कुमारी की मूवी बहुत grim थी और उसपर तुम्हारी मम्मा सुबक सुबक कर  रो रही थीं। "Would someone tell her that it is only happening on screen, not actually! My goodness!" मम्मा बोलीं कि उन्हें भी पता है इतना तो! 

     अमित ने मुझसे कल रात के बारे में पूछा। "So, when are they moving ? Let us invite them for dinner dear . " मैंने सारी बातें बताईं और छटंकी की वो बातें सुन के तो सभी लोग हैरान रह गये। किसी को विश्वास ही जैसे न हो रहा हो कि इतनी छोटी सी बच्ची ऐसे भी बोल सकती है! बड़े बड़े संतों की वाणी रटना तक इतने छोटे बच्चे के लिये संभव नहीं है, और उसपर उसे आत्मसात करना, इतना समझ जाना कि अपनी उपमाएँ दे दी जायें, ये तो एकदम असम्भव सा है।वो जो उसने पानी के न टूटने की बात कही, वो तो आज तक किसी किताब में न पढ़ी किसी ने, न ही सुनी!

 उन लोगों को एक दो दिन में डिनर पर invite करने की बात तय हो गई, फिर हम सभी अपने - अपने रूटीन में बिज़ी हो गये।

                               रात में फ़ोन करके मैंने अर्चना को सपरिवार खाने पर invite किया। Wednesday को Dinner पर आने के लिये वो राज़ी हो गईं। बिरजू काका से मैंने बता दिया कि सारा खाना वह अपनी निगरानी में बनवायें। Menu में एक मछली की डिश ज़रूर रखें, आशीष जी को बहुत पसन्द है। और हाँ, जो चिकेन पैटी बर्गर मैंने U.S. से लौटने के बाद सिखाया है, उसे बच्चों के लिये बनाना न भूलें। उस समय के इलाहाबाद में ये एकदम नहीं available था, बिल्कुल exotic dish थी, और छटंकी को मज़ा आ जायेगा खा कर, नवेली को तो बहुत पसन्द है। 

नियत दिन और नियत समय पर कमिश्नर साहब की फैमिली हमारे यहाँ आ गई। नवम्बर का अंतिम हफ़्ता था, जाड़े की आमद हो चुकी थी। आज शाम से ही घने बादल छाये हैं, इसलिये सर्दी कुछ कम है, सभी लोग comfortably dressed up हैं। कमिश्नर साहब अपने सूट में और अर्चना काही रंग की फिरन में, जिसमें बहुत ख़ूबसूरत कश्मीरी कढ़ाई हुई थी, बहुत जँच रहे थे। मम्मा ने ऑफ़ वाइट कलर की सिल्क की साड़ी जिसका नेवी ब्लू बॉर्डर था, पहनी थी और उसपर पश्मीना की ब्लू शाल ओढ़ रखी थी। और हमारी प्यारी छटंकी, उसका तो जलवा ही निराला था। वैसे तो वो इतनी प्यारी थी कि कुछ भी पहन ले, लाखों करोड़ों में अलग से ही दिख जाये ! और फिर जब उसे तैयार कर दिया जाये तब तो अद्भुत छटा बिखेरती थी। उसने फेडेड पिंक और पीच कलर के मिक्स कलर की ruffle वाली स्कर्ट पहनी थी जिसका टॉप ब्लैक कलर का था और जिसपे वाइट कलर के बड़े बड़े पोल्का सर्कल्स बने हुए थे। अन्दर ब्लैक highneck स्कीवी और पैरों में वाइट स्टॉकिंग्स और ब्लैक फ्लैट बेले शूज़। दो छोटी छोटी पोनीज़ वाले उसके घूँघर वाले बाल! नज़र उसपे से हट ही नहीं रही थी! हम लोगों ने एक दूसरे का अभिवादन किया। अन्दर ड्रॉइंग रूम में आ कर उसने लपक कर मम्मा डैडी के पैर छू लिये ! डैडी ने उसे गोदी में उठाते हुए कहा, " अरे बेटा , ये क्या कर रही हो?" उसने तुरन्त जवाब दिया," नानी माँ ने बोला था बाबा साहब-दादी माँ मिलेंगें वहाँ, तो इसीलिये चरण स्पर्श कर लिया। " मम्मा ने बताया कि आजकल रामायण का वीडियो कैसेट देख रही हैं वो, उसी में से देख कर बच्ची रोज़ सुबह सबका पैर छूना सीख गई है। मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया कि कितने अच्छे सँस्कार हैं इसके, नवेली और उसकी दादी ने मुझे तिरछी नज़र से देखा। हम सास बहू दो डिफरेंट क्लास से आती हैं, वैसे तो मेरी सास कोई सास वाली हरकत नहीं करती हैं, बेटी की तरह ही प्यार भी करती हैं, लेकिन मेरी मिडिल क्लास वाली सोच उन्हें गाहे बगाहे हैरान करती ही रहती है!

       हम लोग बातें करने लगे। डैडी, अमित और आशीष जी पॉलिटिक्स पर गरमा गरम बहस में मशगूल, दोनों मम्मा मौसम, खान-पान वग़ैरह पर चर्चा और हम दोनों सहेलियाँ जॉब रिलेटेड और बच्चों की बातों में मगन। नवेली छटंकी को अपने साथ खेलने के लिये ले गई। बीच में स्नैक्स और ड्रिंक्स सर्व हुए। Cracker and creamy spiced butter, बेक्ड स्पिनच बॉल, फ्राइड काजू और chicken टिक्का और पनीर टिक्का। Caramelized almonds के साथ Grey Goose Vodka और कुछ कोला लिम्का हम लेडीज़ के लिये। बच्चों लायक स्नैक्स वहाँ भिजवाने के लिये कहा तो अर्चना ने मना कर दिया। बोलीं कि बेबी फिर खाना नहीं खा पायेगी। मैंने इण्टरकॉम किया किचेन में और कहा कि बच्चों के लिये जो सामान बने हैं, उन्हें रेडी करके यहीँ ले आयें। उनका खाना पहले सर्व होगा। 

खाना आया और दोनों बच्चियों को भी बुलाया गया। नवेली बड़ों के साथ खाना चाहती थी लेकिन कल सुबह उसका स्कूल था, इसलिये मान गई प्रशस्ति के साथ खाने के लिये। मैंने आर्यन की छोटी वाली चेयर मँगवाई जिसपे छटंकी आराम से खाना खा सके। पहले चिकेन बर्गर और फिंगर चिप्स लाये गये। नवेली के बहुत पसन्दीदा थे, इसलिये वह तो तपाक से शुरू हो गई, लेकिन.. प्रशस्ति ने पहले मंत्र पढ़ना शुरू किया। इस बार मैंने ध्यान से सुना-----

 " ॐ सह नाववतु। 

सह नौ भुनक्तु। 

सह वीर्यं करवावहै। 

तेजस्विनावधीमस्तु। 

मा विदविषावहै।। 

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।। "

सभी लोग दंग रह गये उसे इतनी शुद्धता से संस्कृत पढ़ते हुए! जैसे अपने कानों पर विश्वास न हो रहा हो! इससे पहले कि वो खाना शुरू करती, अर्चना ने पूछा कि इसमें नॉन वेज तो नहीं? मैंने कहा कि chicken patty है, तो वो बोलीं, "सॉरी, मैं बताना भूल गई, इसे मीट से एलर्जी है, मुँह में जाते ही उल्टी हो जाती है। "

अरे, सब लोग आश्चर्य चकित रह गये। फिर क्या खायेगी ये, कुछ बच्चों की स्पेशल डिश तो वेज में बनवाई नहीं है। मम्मा बोलीं, "तुम भी तो वेजीटेरियन हो बेटी, जो सब्ज़ी तुम्हारे लिये है, उसी में से खा लेगी चपाती या चावल के साथ।" मैंने तुरन्त किचेन में ख़ुद जा कर देखा और उसकी प्लेट में मसूर की दाल का क़बाब, आलू मेथी की सूखी सब्ज़ी, दाल माखनी और पालक का पुलाव डलवाया। नान और मलाई कोफ़्ता भी था, लेकिन मुझे लगा कि उसके लिये हैवी हो जायेगा। ये खाना उसके सामने टेबल पर रख कर जब मैंने अर्चना से पूछा कि कोफ्ता और नान खा पायेगी क्या, तो वो बोलीं , " no no, she is a small eater." 

"Okee dokey, can I start now ?" हम सबने लगभग एक साथ ही हँस कर उसे go ahead कहा। उसे खाना अच्छा लग रहा था और वह बहुत चाव से खा रही थी। पालक पुलाव उसे बहुत पसन्द आया, उसने पूछा, "Mausi, can I have some more?" 

"Oh sure my doll " मैंने पालक पुलाव उसकी प्लेट में डाल दिया। मीठे में browny और गाजर का हलवा थे लेकिन उसका पेट भर चुका था, उसने कुछ और लेने से इन्कार कर दिया। हाथ धोने के लिये उठने लगी तो पूछने लगी कि खाना किसने बनाया है। जब मैंने बताया कि कुक केशव ने बिरजू काका के साथ मिल कर बनाया है तो उसने एक नोटपैड और पेन्सिल माँगा और फिर उसपर कुछ लिखने लगी। उसने कहा कि ये नोट वह उन दोनों को देना चाहती है। हमने दोनों लोगों को बुलवाया और उसने खड़े होकर बहुत विनम्रता से उन दोनों को एक एक नोट दिया और नमस्ते की मुद्रा बनाते हुए धन्यवाद कहा।  नोट में लिखा था कि " अंकल, इतना रुचिकर भोजन बनाने के लिये धन्यवाद!' और उसमे एक क्यूट बिल्ली की आँख बंद और दाँत निपोरे ड्रॉइंग थी। वो दोनों तो गदगद हो ही गये थे, हम लोग भी उसके इस शिष्टाचार से अचंभित थे। अभी तीन साल की भी नहीं है जो बच्ची, उससे इस व्यवहार की तवक्को भला कौन कर सकता है! ऐसी courtesy तो बहुत सारे बड़ों को भी नहीं आती कि अपने होस्ट की तारीफ़ कर दें। नवेली ने अपनी browny जो उसने आइसक्रीम के साथ ली थी, अब ख़त्म कर ली थी और वह प्रशस्ति को लेकर अपने रूम में कार्टून पिक्चर देखने चली गई। 

हम लोगों का खाना अब लग चुका था और अमित ने सबको डाइनिंग रूम में चलने का आमंत्रण दिया। स्टफ्ड पॉम्फ्रेट टेबल के बीच में और उसके हर तरफ़ एक से बढ़ कर एक डेलिकेसी, बिरजू काका ने दावत को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हैदराबादी बिरयानी और मिर्ची का सालन, रायता, चिकेन पसन्दा, मलाई कोफ़्ता, मसूर की दाल के क़बाब, आलू मेथी की सूखी सब्ज़ी, नान, पालक पुलाव और फ्रेश गार्डन सलाद। आशीष जी मछली देख के ख़ुश हो गये थे! सबने ख़ूब मज़े लेकर धीरे धीरे बातचीत करते हुए खाना खाया, मीठा ख़तम किया और वापस ड्रॉइंग रूम में आकर बैठ गये। ये हमारी इस शहर में शायद आख़िरी मुलाक़ात हो, ये सोच कर और भी धीरे धीरे हमारा खाना ख़तम हुआ था। सबको आधा आधा कप कॉफ़ी की तलब थी, या उसी बहाने कुछ और वक़्त साथ गुज़ारा जा सकता था। प्रशस्ति नवेली के साथ ही उसी के रूम में सो चुकी थी, इसलिये उसके सोने की भी चिन्ता नहीं थी। मम्मा डैडी तो अक्सर देर रात की पार्टी में जागते रहते थे तो उन लोगों को भी कोई दिक्क़त नहीं थी। 

अर्चना ने मुझसे कहा कि जब भी टाइम मिले, मैं छटंकी और मम्मा को देख आया करूँ, इससे उन्हें इत्मिनान रहेगा। वो न कहतीं तो भी मैं यही करती। इस नन्हीं परी में तो मेरी जान बसती है! कॉफ़ी का सिप लेते लेते हम लोग थोड़ी देर और यूँ ही बात करते रहे। फिर आख़िर चलने का समय आ गया। आँखों में आँसू छुपाते हुए हम दोनों सहेलियों ने एक दूसरे से विदा ली। आशीष जी प्रशस्ति को खुद नवेली के रूम से गोद में उठा कर लाये और गुड नाईट कहते हुए कार की पिछली सीट पर बैठ गये। ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी और पलकों में वो लोग हमारी आँखों से ओझल हो गये।


 

1 comment:

  1. Very gripping story. Waiting for the next chapter. Please make it faster this time.

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