Thursday, August 26, 2021

(अध्याय 10 )

 

                                 बरसात की वो रात

 शाम को कुछ बूंदा-बांदी होने लगी। रात तक घनघोर बारिश के आसार थे। ऐसी जाड़े की रात मेरा तो कहीँ जाने का मन नहीं होता, लेकिन अग्रवाल अंकल की बात ही कुछ और है। उनके घर जाने का मतलब है ढेर सारे कहकहे और साथ ही नायाब क़िस्से। अंकल के बड़े भाई फ्रीडम फाइटर थे अपने बचपन में, बाद में आई. ए. एस. हो गये थे। उन्हीं के क़िस्से वो सुनाते थे जो बहुत इंटरेस्टिंग होते थे। इसलिये तय था कि उनकी पार्टी तो किसी हाल में मिस नहीं होगी। 

हम सभी तैयार हो गये टाइम पर। बस नवेली घर में रहेगी क्योंकि उसके टेस्ट्स चल रहे हैं और पार्टी से लौटने में देर तो हो ही जाती है। बिरजू काका की वजह से कोई चिन्ता नहीं होती उसे रात में अकेला छोड़ने में। सर्दियों में साड़ी मैं नहीं पहनती थी अब तक, लेकिन आजकल साड़ी बाँधने का अक्सर मन हो जाता है। यू एस से मैं शीयर पैंटीहोज़ लाई थी, उसको पहनने के बाद पैरों में सर्दी बिल्कुल नहीं लगती इसलिये साड़ी में ठंड लगने का डर भी नहीं। मेरी मम्मी को खादी सिल्क बहुत पसन्द है और मेरी शादी में 4 -5 गाँधी आश्रम की खादी सिल्क की साड़ियाँ भी दी थीं। इस सिल्क की ये ख़ासियत है कि आप इसे पहन के सो भी जाइये, इसकी क्रीज़ बनी रहेगी! लैवेंडर कलर की साड़ी पर  छोटे छोटे हाथी, घोड़े, सुराही, हुक्का और ऊँट के घने प्रिंट। डार्क पिंक कलर का पतला बॉर्डर। इसके साथ इसी रंग का सिल्क का फ़ुल स्लीव का ब्लाउज़। आज यही साड़ी निकाली है पहनने के लिये। 

अग्रवाल अंकल के यहाँ कारों का ताँता लगा हुआ है। अन्दर पँहुच कर अर्पिता ने हम लोगों का स्वागत किया। अर्पिता संदीप की वाइफ है और मेरी फ्रेंड भी। उम्र में मुझसे बड़ी है लेकिन कहती है नाम लेकर बुलाया करो। सभी लोग अपने अपने ग्रुप में बँट गये। सासों का और बहुओं का ग्रुप, पिताओं और बेटों का ग्रुप। बच्चे किसी के नहीं आये थे। संडे की पार्टी का ये ड्रॉबैक तो होता ही है। कॉकटेल मॉकटेल का दौर शुरू हुआ। सभी लोग मुझसे बहुत दिनों बाद मिल रहे थे, असल में मैं पार्टियों में ज़्यादा जाती जो नहीं हूँ। खाना ख़त्म कर के हम लोग फायरप्लेस वाले बड़े से ड्रॉइंग रूम में चले गये।हमारी तरह ही अग्रवाल अंकल की भी अंग्रेज़ों के ज़माने वाली बड़ी सी कोठी है जिसमें हॉलनुमा कमरे हैं। Dessert के साथ अंकल की कहानी का लुत्फ़ ही निराला है! उनके घर की पार्टी में यही होता है कि पहले सभी लोग अपने-अपने ग्रुप में मनमर्ज़ी की बातें कर लेते हैं, फिर मीठे के साथ अंकल की कहानी शुरू हो जाती है, साथ में चाय कॉफ़ी चलती है। 

"हाँ भाई, तो आप लोग आज भी छोड़ोगे नहीं, क़िस्सा सुन के ही मानोगे! अब मैं कोई क़िस्सागो तो नहीं! हा हा !" अग्रवाल अंकल ने अपने मस्ती भरे अंदाज़ में कहा। 

"चलो ज़्यादा भाव न लो, तुम्हें भी पता है तुम्हारे घर खाने के लिये नहीं, क़िस्सा सुनने के लिये ही सब आते हैं! खाना तो बस बहाना है!" डैडी ने कहा। 

"हा हा ! चलो फिर शुरू करते हैं। " अंकल ने कहा। "तो आज सोच रहा हूँ राजा साहब का किस्सा सुनाया जाये। वैसे तो ये असली घटना है, बड़े भाईसाहब की पहली पोस्टिंग थी लखीमपुर खीरी में, आज़ादी मिले कुछ ही साल हुए थे। राजे रजवाड़े ख़तम हो गये थे, प्रिवी पर्स मिलता था जो राजा होता था और उसके बाद उसके बड़े बेटे को। तो भाईसाहब को जो मकान मिला था, वो इन्हीं राजा साहब के कम्पाउंड में था। राजा साहब ये कहलाते ज़रूर थे, लेकिन पिता की मौत के बाद प्रिवी पर्स इनके बड़े भाई को मिलता था और सारी ज़मीन जायदाद भी उनकी ही थी। बस कुछ मकान और खेत इनके हिस्से में रह गये थे। 

राजा साहब दोहरे बदन के काले और नाटे आदमी थे। चेहरे पर चेचक के दाग़ और हर समय मुँह में सिगरेट। एक बार रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे। आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था, कारोबार कोई ढंग का करते नहीं थे, बस शेख़ चिल्ली की तरह मन्सूबा बनाते रहते थे। इनके कम्पाउंड में चार बँगले थे, सबसे बड़े में ये ख़ुद परिवार के साथ रहते थे, एक भाईसाहब को और बाकी दो पी डब्लू डी के इंजीनियर और डी एस पी को किराये पर दिये हुए थे। उनके किराये से राशन पानी चलता था और बीच बीच में खेत बेच कर पैसा लाते थे और कुछ घर में झूठी शानो-शौक़त में लगा कर कलकत्ता निकल जाते थे किसी बाई जी के कोठे पर। जब सारे पैसे वहाँ ख़र्च हो जाते थे तो फिर घर का रुख करते थे। तो मैं बता रहा था कि स्टेशन पर ये ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे। भाईसाहब भी वहाँ पहुँचे। इन्होंने जूतों में घड़ी लगवा रखी थी, समय देखना हो तो कौन हाथ की घड़ी देखे, दोनों जूते समय बताते थे! अब इनके कान में खुजली हुई, इन्होंने जेब से एक सौ रुपये का नोट निकाला, उसको हाथ से बीड़ी या तीली की तरह रोल किया, कान खुजलाया और प्लेटफॉर्म पर फेंक दिया! उस ज़माने का सौ रूपया आजकल के हज़ारों  के बराबर होगा! "

कमरे में सनसनी फैल गई।

"उस नोट को प्लेटफार्म पर झाड़ू लगाने वाले ने उठा लिया। ख़ूब दुआएं दीं, उसकी तो जैसे लाटरी निकल आई। भाईसाहब बताते थे कि राजा साहब की पत्नी, यानि रानी साहब, औरतों से भी पर्दा करती थीं। वो किसी के घर नहीं जाती थीं, कर्टसी कॉल पे भाभी और डी एस पी साहब की वाइफ गईं तो उन्होंने एक हाथ लम्बा घूँघट कर रखा था! कोई उनका चेहरा नहीं देख सका, जो कुछ बोलना था इन्हीं लोगों ने बोला और लस्सी पी कर चली आईं !

गर्मी के दिनों में भाभी अपनी ससुराल और मायके के लिये जाती थीं क़रीब डेढ़ दो महीने के लिये। भाईसाहब अकेले रहते थे। एक  शाम करीब आठ बजे रानी साहब की नौकरानी आई और भाईसाहब से बोली कि रानी साहब ने आपको बुलाया है। उस समय तक चपरासी घर जा चुके थे। भाईसाहब ने सोचा कि भाभी को बुलाया होगा, वो बोले कि मिसेज़ घर पे नहीं हैं। लेकिन उसने कहा कि आप को बुलाया है, आपकी पत्नी को नहीं। अब भाईसाहब हैरान! जो महिला महिलाओं में भी घुलती मिलती नहीं, वो एक मर्द को रात में कैसे बुला सकती है? खैर! जाना था सो गये। 

राजा साहब तो कलकत्ता गये थे। घर में रानी और उनके चार बच्चे और ये नौकरानी थे। नौकरानी उनको ड्राइंग रूम में न ले जा कर सीधे कमरे में ले गई। पलँग पर एक बहुत खूबसूरत छरहरे बदन की, तीखे नाक नक्श की और दूध सी गोरी महिला बैठी थी।अधेड़ावस्था में भी रूप निखरा हुआ था, बस माथे पर सिलवटें पड़ गईं थीं और चेहरे पर मायूसी और एक अजब वीरानी थी। 

उन्होंने हाथ के इशारे से भाईसाहब को बैठने कहा। पलँग के बगल में एक आराम कुर्सी थी, जिसपे वो बैठ गये। उन्हें बेहद आश्चर्य हो रहा था कि कैसे इस महिला ने उन्हें रात में अपने बैडरूम में बुला लिया जो कि दिन के उजाले में महिलाओं तक से पर्दा करती है! इसी हैरानी में वो बैठे थे कि रानी साहब ने कहा," हमने  तुम्हें कल  खिड़की से देखा था। हमारा छोटा भाई एकदम तुम्हारे जैसा है। तुम्हें देख के हमें अपने भाई की बहुत याद आई भईया ! उससे तो अब जाने किस जनम में भेंट हो, क्या तुमसे ये बहन ये आशा कर सकती है कि अपना सुख-दुःख कह सके?" भाईसाहब अब थोड़ा रिलैक्स हुए और खुशी से उनके भाई बन गये !

नौकरानी खाने का थाल लेकर आई लेकिन भाईसाहब खाना खा चुके थे इसलिये उसे वापस कर दिया। रानी साहब ने बताया कि ये दुर्गा उनके ब्याह के साथ आई थी, तबसे साथ ही रहती है। उस समय का एक मज़ेदार वाक़या है। एक दिन शादी के बाद राजा साहब ने दुर्गा को बुलाया और कहा कि पीठ में खुजली कर दे। वह खुजलाने लगी लेकिन राजा साहब को कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था। वो बोले की खरहा (घोड़े का ब्रश) लाओ फिर उससे करो। दुर्गा हैरान कि इतने नुकीले सामान से कैसे करे लेकिन राजा साहब का हुकुम, तो जब उससे खुजलाया तब उन्हें राहत हुई ! असल में राजा साहब अखाड़े में कुश्ती करते थे, उस मिट्टी को बदन में पोतते थे,उसपर तेल मालिश भी करवाते थे जैसे अखाड़े के पहलवान करते हैं, लेकिन वो नहाते केवल दशहरा के दशहरा थे। साल भर की तेल मिट्टी परत दर परत उनके बदन पर चिपक कर खुजली और बदबू दोनों को बराबर दावत देती रहती थी! ऐसी मोटी परत पे नाख़ून का क्या असर हो सकता है!

भाईसाहब हैरान कि कैसे इस सुन्दर युवती ने ऐसे जंगली आदमी के साथ निबाहा होगा, ये आज भी सुकोमल लगती हैं इस उम्र में और तब तो और भी ... ख़ैर रात ज़्यादा होने लगी थी तो वो घर जाना चाहते थे। रानी साहब ने कहा कि " जाओ भइया, कल हम आ जायेंगे तुम्हारे यहाँ, जब तुम्हारे चपरासी लोग चले जायेंगे उसके बाद, और खाना हम ले आयेंगे या बनायेंगे वहाँ आकर, अपनी बहन के हाथ का खाना खाओगे तुम जब तक भाभी नहीं आती। "

                   फिर तो रोज़ का ये सिलसिला रहा। रानी साहब खाना लेकर दुर्गा के साथ आतीं, फिर दुर्गा चली जाती और बारह एक बजे रात तक वो बातें करतीं। शादी के बाद एक बार भी वो पलट कर अपने मायके नहीं गई थीं और उनका भाई बस शुरू के तीन चार साल तीज पर आया, तब से आज तक मिलना नहीं हुआ। रानी साहब बहुत उद्वेलित हो जाती हैं कभी कभी, जीवन से निराश, अपनी परिस्थितियों से दुःखी, ऐसे में भाई का हमशक़्ल मिल जाने पर न जाने कितनी बातें हैं, न जाने कितने क़िस्से हैं, जो एक साथ मुखर हो चले हैं। "जानते हो भइया, एक समय था जब हमारे घर छप्पन व्यंजन हर दिन बनता था। थाल लेकर हर एक के कमरे में नौकर जाते थे, अब पूरा खाना तो कोई खा नहीं पाता था, कभी किसी का जो मन हुआ, थोड़ा सा खाता था, जूठा खाना इकठ्ठा करके मेहतर (स्वीपर) अपने घर ले जाता था।  उसका परिवार भी इतना सारा बचा हुआ खाना नहीं खा पाता था तो उन लोगों ने एक बड़ा सा गड्ढा खोदा हुआ था, उसमे वो खाना डाल देते थे। आज देखो, अन्न की बेकद्री का फल, कई दिन हो जाते हैं अच्छा खाना देखे। " उन्होंने साड़ी के कोर से अपनी आँखें पोंछी। 

एक दिन रानी साहब बताने लगीं कि राजा साहब ने दूध का गिलास वापस भिजवा दिया, हमेशा की तरह उसे फ़ेंक दिया जाता लेकिन पैसों की तंगी शुरू हो चुकी थी तो उन्होंने सोचा कि इसमें से थोड़ा थोड़ा दूध बच्चों की गिलास में डाल के काम में ले आया जाये। तो चारों बच्चों की गिलास में बराबर से इस दूध को मिला दिया गया। लेकिन बच्चे  एक घूँट भी नहीं पी पाये, उन्हें उल्टी हो गई ! असल में राजा साहब गिलास में आधी गिलास तो चीनी से भरवाते थे, तब दूध डाला जाता था! अब इसका चौथाई भी इतना तेज़ मीठा था कि कोई बच्चा नहीं पी पाया!"

अग्रवाल अंकल अभी राजा साहब की कहानी सुना ही रहे थे कि घर से कॉल आई कि आर्यन अपनी बुआ के साथ आया है हमें सरप्राइज करने! हम दोनों तीर की तरह सबसे विदा लेकर निकल पड़े! बेटे के आने की ख़ुशी इतनी थी कि झमाझम होती इस घनघोर बरसात में भी अमित बहुत स्पीड से ड्राइव कर रहे थे। एक सेकेंड की भी दूरी नागवार लग रही थी, मैंने कहा कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा, इतनी स्पीड मत रखिये, लेकिन बेताबी इतनी थी कि कोई परवाह नहीं की। कार में गाना भी बज रहा था बिजली बारिश वाला... तुम जो मिल गये हो, तो यूँ लगता है , कि जहाँ मिल गया! गाने में बिजली कड़की और bangg ...... सिर तेज़ी से डैशबोर्ड से टकराया, आँखों में अँधेरा और साँस नहीं आ रही ...... सब शून्य.....



 

 

3 comments:

  1. Very gripping and well knit plot. Concluding lines have evoked high curiosity. Please share the next chapter soon.

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  2. Very nice and gripping novel. Well constructed plot.Waiting for next chapter, curiosity bahut hai ki phir kya hua...

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(अध्याय 10 )                                    बरसात की वो रात  शाम को कुछ बूंदा-बांदी होने लगी। रात तक घनघोर बारिश के आसार थे। ऐसी जाड़े की...